समयसार गाथा-६८ ] [ २२प साचुं ज्ञान कहे छे. सम्यक् एकान्त तरफ ज्यारे ढळे छे त्यारे तेने जे ज्ञान थाय छे ते स्वनुं छे, अने ते ज काळे जे राग बाकी छे ते पर्यायनुं पण ज्ञान थाय छे अने ते साचुं अनेकान्त छे. सम्यक् एकान्त (शुद्ध चैतन्यमय वस्तु)नुं ज्ञान राखीने पर्यायनुं ज्ञान थाय ते अनेकान्त छे.
प्रमाणज्ञानमां पण, त्रिकाळी शुद्ध द्रव्यनुं-एकान्त निश्चयनुं ज्ञान थाय त्यारे पर्याय अने रागने पण जाणवां ए प्रमाणज्ञान छे. ते प्रमाणज्ञान पण खरेखर तो सद्भूत व्यवहारनयनो विषय छे, कारण के एमां बे (द्रव्य अने पर्याय) आव्यां ने? अने ते कारणे प्रमाण पूज्य नथी. जेमां पर्यायनो निषेध आवतो नथी एवुं प्रमाणज्ञान पूज्य नथी, ज्यारे निश्चयनयमां पर्यायनो निषेध आवे छे माटे ते पूज्य छे एम कह्युं छे. प्रमाणज्ञानमां, निश्चयथी द्रव्य अभेद छे एवुं ज्ञान राखीने एमां रागनुं, पर्यायनुं ज्ञान भेळव्युं छे. निश्चयना ज्ञानने उडाडीने रागनुं, पर्यायनुं ज्ञान भेळव्युं छे एम नथी. जो निश्चयनुं ज्ञान उडाडे तो ते प्रमाणज्ञान ज नथी, त्रिकाळी द्रव्य शुद्ध छे एवुं ज्ञान राखीने, ते उपरांत पर्यायनुं ज्ञान कर्युं त्यारे ज्ञान प्रमाणज्ञान-सम्यग्ज्ञान थयुं छे. ‘द्रव्य शुद्ध छे’ एवुं निश्चयनुं ज्ञान ते सम्यक् एकान्त छे. आ निश्चयना ज्ञानने उडाडीने, जो रागनुं ज्ञान थाय तो ते प्रमाणज्ञान ज नथी. आवो झीणो मार्ग छे, पण आ ज मार्ग छे. सूक्ष्म कहो के झीणो कहो; वस्तु आ ज छे.
अहाहा! ‘इदम् चैतन्यम्’–इदम् एटले आ. आ एटले आ अनादि, अनंत, चळाचळता रहित, स्वसंवेद्य प्रगट वस्तु छे ते चैतन्यस्वभावमय छे. आत्मा वीतराग सर्वज्ञस्वरूप चैतन्यस्वभावमय छे अने ते चैतन्यनी निर्मळ परिणति द्वारा जणाय एवो प्रत्यक्ष छे. वीतराग सर्वज्ञ परमात्मा त्रणलोकना नाथ सभामां इन्द्रोने एम कहेता हता के प्रभु! जेम अमे वीतराग सर्वज्ञ छीए एम तुं पण वीतराग सर्वज्ञस्वरूप छे. अमे वीतरागस्वभावमांथी ज वीतराग थया छीए. माटे कहीए छीए के वीतराग चैतन्यस्वरूप आत्मा वीतराग परिणति द्वारा जणाय एवो प्रत्यक्ष छे. अहाहा! वीतरागदेवे वस्तु वीतराग ज्ञ-स्वरूप कही छे अने एने जाणनारी परिणति पण वीतरागतामय ज कही छे. प्रभु! जो तुं जिनस्वरूप न होय तो जिनपणुं पर्यायमां कयांथी प्रगट थशे? अहा! तुं चैतन्यस्वभावी आत्मा जिनस्वरूप ज छो अने तेने जाणनारी पर्याय वीतराग-परिणति ज छे. आ वीतराग परिणति धर्म छे. लोकोने आ समजवानी नवराश न मळे एटले सामायिक, पोहा अने प्रतिक्रमण इत्यादि क्रियाकांड करे अने माने के धर्म थई गयो. पण बापु! ए तो बधा रागना प्रकार छे अने एनाथी चैतन्यस्वरूप आत्मा जणातो नथी.
हवे आगळ कहे छे के-आ चैतन्य केवुं छे? के ‘उच्चैः चकचकायते’ अत्यंतपणे