४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ कर्म छे. वळी अनादि अज्ञानथी तो कर्ताकर्मनी प्रवृत्ति छे, कर्ताकर्मनी प्रवृत्तिथी बंध छे अने ते बंधना निमित्तथी अज्ञान छे; ए प्रमाणे अनादि संतान (प्रवाह) छे, माटे तेमां इतरेतर- आश्रय दोष पण आवतो नथी. आ रीते ज्यां सुधी आत्मा क्रोधादि कर्मनो कर्ता थई परिणमे छे त्यां सुधी कर्ता- कर्मनी प्रवृत्ति छे अने त्यां सुधी कर्मनो बंध थाय छे. * * * ल्यो, हवे कर्ता-कर्मनो अधिकार आवे छे. आ समयसार तो भरतक्षेत्रनो भगवान छे. अहाहा....! शुं अद्भुत एनी रचना छे! अलौकिक गाथाओ अने अलौकिक टीका छे. देवाधिदेव अरिहंतदेवनी साक्षात् दिव्य-ध्वनिनो सार लईने श्री कुंदकुंदाचार्यदेवे आ समयसारनी रचना करी छे. अहो समयसार! भावो ब्रह्मांडना भर्या! (तारामां).
पहेला अधिकारमां आचार्यदेवश्रीए जीव-अजीव द्रव्यनी भिन्नतानी वात करी; जीव अने अजीव द्रव्यो सौ स्वतंत्र अने भिन्न छे एम सिद्ध कर्युं. हवे जीव अने अजीव द्रव्योनी पर्यायमां (कर्ता-कर्म संबंधी) जे भूल थाय छे तेनी आ अधिकारमां वात छे. भाई! पर्यायमां जे भूल छे ते संसार छे, अने ते भूल मटतां, भूलनो अभाव थतां मोक्ष प्राप्त थाय छे. आ वात छे.
हवे प्रथम पंडित श्री जयचंद्रजी मांगळिकनुं पद कहे छेः-
कर्ता एटले थनारो. स्वतंत्रपणे करे ते कर्ता अने कर्तानुं इष्ट ते कर्म. ज्ञानीनुं इष्ट ज्ञान छे अने अज्ञानीनुं राग-द्वेष. अहीं कहे छे के आत्मा कर्ता अने राग-द्वेषादि विकार एनुं कर्म-ए विभाव एटले स्वभावथी विरुद्ध भाव छे, अज्ञान छे. अहाहा! हुं कर्ता अने पर्यायमां जे राग-द्वेषादि विकार थाय के ते वेळा जे ज्ञानावरणादि कर्म बंधाय ते मारुं कर्म-ए अज्ञान छे. आवा अज्ञानने दूर करीने जे ज्ञानभावे परिणमे ते राग-द्वेषनो कर्ता मटीने ज्ञाता थाय छे. प्रश्नः– अहीं पर्यायमां रागादि भाव छे तेथी परमाणुओ ज्ञानावरणादि कर्मपणे परिणमे छे ने?
उत्तरः– एम नथी, भाई! ए कर्मयोग्य परमाणुओनी कर्मभावे परिणमवानी जे ते समये योग्यता अने जन्मक्षण छे तेथी स्वयं ज्ञानावरणादि कर्मभावे परिणमे छे अने त्यारे रागादि भाव छे ते एमां निमित्त छे. रागादिथी ज्ञानावरणादि कर्म