२२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
ए बंधना निमित्तथी अज्ञान छे. एटले के ए बंधना उदयकाळे पोते स्वतंत्रपणे नवुं अज्ञान करे छे त्यारे पूर्वकर्मनो बंध निमित्त छे. बंधने लईने अज्ञान छे एम नथी पण पोते स्वयं अज्ञानरूपे परिणमे छे त्यारे पूर्वना बंधना उदयने तेनुं निमित्त कहेवामां आवे छे. बंधनुं तो निमित्त छे, उपादान स्वयं पोतानुं अज्ञान (पर्याय) छे. आ प्रमाणे अनादि संतान छे, प्रवाह छे. नवा कर्मबंधनुं निमित्त अज्ञानभाव छे अने ए अज्ञानभावनुं निमित्त तो जूनां पूर्वनां कर्मनो उदय छे. आ प्रमाणे अनादि प्रवाह छे, माटे एमां इतरेतराश्रय दोष आवतो नथी.
प्रश्नः- ‘मोहावरणक्षयात्’–शास्त्रमां तो एम आवे छे ने?
उत्तरः– ‘मोहावरणक्षयात्’ एटले मोहनो सर्वथा क्षय थवाथी सर्वज्ञपद प्रगट थाय छे. परंतु त्यां जे स्वदोष छे ते निश्चयथी आवरण छे अने कर्मनुं निमित्त छे ते व्यवहारथी आवरण छे.
वळी ज्यां एम आवे के बे कारणोथी कार्य थाय छे-१. उपादानकारण अने २. सहकारीकारण. त्यां एनो अर्थ ए छे के सहकारी (निमित्तपणे) एक चीज छे तेनुं ज्ञान कराव्युं छे, पण सहकारी कारणथी उपादानमां कार्य थाय छे एम बीलकुल नथी. रागनी उत्पत्ति आत्मा स्वतः पोताना अज्ञानभावथी करे छे अने कर्मनो बंध पण स्वतः (रजकणोनी) पोतानी योग्यताथी थाय छे. विकार थवानी पोतानी योग्यता छे अने जे कर्म बंधायां ते एनी योग्यताथी बंधायां छे. विकार कर्यो माटे कर्मने बंधावुं पडयुं एम नथी, तथा कर्मना उदयना कारणे विकार थयो एम पण नथी. सर्वत्र योग्यता ज कार्यनी साक्षात् साधक छे. निमित्त ए वास्तविक कारण नथी, उपचारथी कारण कहेवाय छे.
आ रीते ज्यां सुधी आत्मा अज्ञानथी क्रोधादि कर्मनो कर्ता थई परिणमे छे त्यांसुधी कर्ताकर्मनी प्रवृत्ति छे अने त्यांसुधी कर्मनो बंध थाय छे.