समयसार गाथा ६९-७० ] [ २१
कर्ता-ए वात तो अहीं छे ज नहि, केमके परद्रव्य तो भिन्न स्वतंत्र छे. एनी क्रियानो कर्ता तो अज्ञानी पण नथी.
अरे! जीवने पोतानी दरकार नथी के अरे! मारुं शुं थशे? रात-दिवस रळवुं-कमावुं, खावुं-पीवुं, हरवुं-फरवुं इत्यादिमां ज समय वीती जाय छे. आ तो समय (कल्याण करवानो) वीती जाय छे. भाई! तुं मरीने तत्त्वनी द्रष्टि विना कयां जईश? त्रणलोकना नाथ देवाधिदेव परमात्मा कहे छे के-तुं आत्मा छो, पुण्य-पापना भाव ए तो आस्रव छे. ए आस्रव तुं नथी. आम बन्नेनी भेदद्रष्टि करी ज्ञानस्वरूपी निज आत्मतत्त्वने ग्रहण कर, केमके ते स्वभावभूत क्रिया छे, धर्मनी क्रिया छे.
तद्न सीधी सरळ वात छे. समजवा मागे तो समजाय एम छे. आत्मा अने आस्रवनो ज्यां लगी भेद जाणे नहि त्यां सुधी कर्ताकर्मनी प्रवृत्ति पर्यायमां रह्या करे छे.
क्रोधादिरूप परिणमतो ते पोते कर्ता छे अने क्रोधादि तेनुं कर्म छे. खरेखर तो ते समयनी पर्याय ते ज कर्ता अने ते ज एनुं कर्म छे. जे शुभाशुभ राग परिणाम छे एनो कर्ता ए पर्याय, कर्म पण ए पर्याय, साधन-संप्रदान, अपादान अने अधिकरण -ए पर्याय छे. पर्यायनां षट्कारक स्वतंत्र छे. एनाथी ते परिणाम स्वतंत्र उत्पन्न थाय छे. अज्ञानी ते विकारी परिणामनो पोताने कर्ता मानी विकारीकर्मपणे परिणमे छे अने ते संसार छे. एनाथी नवो बंध थाय छे.
धर्मी जीव आत्मा अने रागने भिन्न जाणतो ज्ञाननी क्रियारूप परिणमे छे. ज्ञाननी क्रियानो हुं कर्ता अने ज्ञाननी क्रिया ते मारुं कर्म एम धर्मी माने छे. खरेखर तो ज्ञाननी निर्मळ पर्यायनो कर्ता ए पर्याय पोते, एनुं कर्म पण ए पर्याय पोते छे. निर्मळ पर्याय पण एना षट्कारकथी स्वतंत्रपणे उत्पन्न थाय छे. ध्रुवमां एकाग्र थतां जे स्वभावपर्याय थई ते धर्म छे. ए पर्यायनो कर्ता पर्याय छे. अहीं आत्मा एनो कर्ता छे एम कह्युं ते अभेदथी वात करी छे.
‘अनादि अज्ञानथी कर्ताकर्मनी प्रवृत्ति छे, कर्ताकर्मनी प्रवृत्तिथी बंध छे अने ते बंधना निमित्तथी अज्ञान छे; ए प्रमाणे अनादि संतान छे, माटे तेमां ईतरेतराश्रय दोष आवतो नथी.’
जुओ! स्वरूपना भान विना विकारनो स्वामी थई जीव पोते विकार करे त्यारे नवो कर्म-बंध थाय छे. जे कर्म बंधाय छे ते स्वयं स्वतः पोताना कारणे बंधाय छे. कर्मरूपे बंधावानी लायकातवाळा परमाणु स्वयं पोताथी कर्मरूपे परिणमे छे. त्यां जीव अने कर्मनुं एकक्षेत्रावगाहे रहेवुं ए संबंध छे, पण एकबीजाना कर्ताकर्मपणे थवुं एवो संबंध नथी.