२० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
जेम अग्निमां उष्णता एकरूप छे तेम आत्मा अने एनो ज्ञानस्वभाव एकरूप छे, तद्रूप छे, तादात्म्यरूप छे. आवा ज्ञानस्वभावी आत्मानी सन्मुख थई एकाग्रता थतां जे परिणमन थयुं ते ज्ञाननी क्रिया छे. ते सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप धर्म छे. आ क्रिया निज स्वभावरूप होवाथी निषेधी शकाती नथी. परंतु ज्ञान अने रागादि विकार भिन्न छे. ज्ञान आनंदस्वरूप छे अने विकार दुःखरूप छे. आम ज्ञान अने रागादि विकारनी भिन्नता नहि जाणवाथी, जाणे के पुण्य-पापना शुभाशुभ विकारी भाव पोतानो स्वभाव छे एम मानीने ज्यांसुधी शुभाशुभभावे परिणमे छे त्यांसुधी ते (अज्ञानी) विकारी परिणामनो कर्ता थाय छे, अने विकारी परिणाम तेनुं कर्म छे. परद्रव्यनो कर्ता तो आत्मा छे ज नहि, केमके परद्रव्य भिन्न स्वतंत्र चीज छे. ए (परद्रव्य) स्वयं पोताना कारणे परिणमे छे. छतां परद्रव्यने हुं करुं छुं. शरीर, मन, वाणीनी क्रिया हुं करुं छुं-एम जे माने ते मिथ्याद्रष्टि छे. तथा पर्यायमां जे शुभाशुभ विकारी भावो थाय, दया, दान आदिना परिणाम थाय तेनो हुं कर्ता छुं एम माने ते पण अज्ञानी मिथ्याद्रष्टि छे. अहाहा....! आत्मा वस्तु ज्ञानस्वभावी, सर्वज्ञस्वभावी त्रिकाळी ध्रुव सहज शुद्ध द्रव्य छे. एमां राग नथी, पुण्य नथी, पाप नथी, विकार नथी के अल्पज्ञता नथी. ए तो अनंत शक्तिओनो पिंड परिपूर्ण चैतन्य भगवान छे. एमां ज्यां द्रष्टि एकाग्र थई त्यां परिणमन निर्मळ थयुं. ए निर्मळ परिणमन आत्मानी स्वभावभूत धार्मिक क्रिया छे अने ते निषेधवामां आवी नथी. परंतु आ अखंड एकरूप चैतन्य भगवान ते हुं एम पोताना अस्तित्वनो अज्ञानीने स्वीकार नथी. ए तो दया, दान, व्रतादिना परिणाम जे राग छे ते मारा छे, एम माने छे. अने एम मानीने रागभावे परिणमतो ते रागनो कर्ता थाय छे. अरे! जगतना जीवोने आवा सूक्ष्म तत्त्वनी खबर ज कयां छे! परंतु भाई! आ समजवुं पडशे. आ समज्या विना जन्म-मरणथी छूटवानो बीजो कोई उपाय नथी. अरे! जगतना जीवोए रागनी रुचिमां चैतन्यस्वभावी निज आत्मानो त्याग करी दीधो छे, त्रणलोकना नाथने हेय करी दीधो छे. आनाथी बीजो क्रोध अने द्वेष शुं छे? निर्मळानंदनो नाथ चैतन्यस्वभावी भगवान आत्मानी सन्मुख न जोतां एनाथी विरुद्ध रागमां एकत्व करी जोडाई जवुं ए ज क्रोध अने द्वेष छे. अहीं कहे छे ज्ञानस्वरूपी आत्मा अने क्रोध-मान-माया-लोभरूप विकारो ए बेनी भिन्नता जाणतो नथी त्यां सुधी जीवने कर्ताकर्मनी प्रवृत्ति छे. विकारी परिणाम ते मारुं कर्तव्य अने हुं तेनो कर्ता एम अज्ञानी माने छे, अने एम परिणमे छे. शरीर, मन, वाणी इत्यादि परद्रव्यनी क्रियानो