Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा ६९-७० ] [ १९

अनेकात्मक एटले जीव-पुद्गलनो एम बे द्रव्योनो जे बंध छे एमां ईतरेतराश्रय दोष नथी, केमके अनादि प्रवाहपणुं छे. (आनाथी आ अने एनाथी ए-एने ईतरेतराश्रय दोष कहे छे. जीवना राग-परिणामथी बंध अने ए ज बंधथी रागपरिणाम थाय तो ईतरेतराश्रय दोष कहेवाय. परंतु एम नथी. अज्ञानी जीव रागद्वेषरूपे परिणमे त्यारे नवां कर्म बंधाय अने ते अमुक स्थिति सुधी एकक्षेत्रावगाहे रहे; तथा जे रागद्वेषरूपे परिणमे छे एमां पूर्वना कर्मनो उदय निमित्त होय छे. आ प्रमाणे जे परिणामथी कर्मनो बंध थयो ते बंध विकार परिणामनुं निमित्त थतुं नथी, पण ते परिणाममां जूना कर्मनो उदय निमित्त थाय छे. तथा जे विकारी परिणाम थया ते नवीन कर्मबंधनुं निमित्त थाय छे. आ प्रमाणे ईतरेतराश्रय दोष नथी.)

पहेलां आत्मा शुद्ध हतो अने पछी विकारी थयो, पहेलां कर्मबंध नहोतो अने पछीथी कर्म बंधायां एम नथी. अर्थात् आत्माना विकारी परिणामथी कर्म थयां अने कर्मथी विकारी परिणाम थया एम नथी. बन्ने अनादिथी स्वतःसिद्ध छे. अनादिकाळथी कर्म कर्मरूपे अने आत्माना परिणाम विकाररूपे स्वतंत्रपणे थता आव्या छे. कोईथी कोई थया छे एम नथी. अनादिथी पुराणां कर्म खरतां जाय अने एनुं निमित्त पामीने जीवमां नवा नवा विकारी परिणाम थता जाय तथा एनुं निमित्त पामीने नवां कर्म बंधातां जाय एम प्रवाह छे; आ प्रमाणे अनादि प्रवाहपणाने लीधे जीव-पुद्गलनो जे बंध थाय छे एमां ईतरेतराश्रय दोष नथी.

अनादिकाळथी आवो जे बंध छे ते कर्ताकर्मनी प्रवृत्तिनुं निमित्त जे अज्ञान तेनुं निमित्त छे.

कर्ताकर्मनी प्रवृत्तिनुं निमित्त अज्ञान छे. अने अज्ञाननुं निमित्त पूर्वनां जूनां कर्मनो बंध छे. अज्ञान कांई आत्मानो मूळ स्वभाव नथी. अज्ञान-पर्याय स्वयं (अशुद्ध) उपादान छे अने तेनुं निमित्त पूर्वनो कर्मबंध छे. कर्म छे ते कांई अज्ञान करावी दे छे एम नथी, परंतु पोते ज्यां लगी राग-द्वेष-अज्ञान कर्या करे छे त्यां लगी कर्म निमित्त थाय छे.

निज चैतन्यस्वभावना लक्षे जेने अज्ञान टळी जाय छे तेने कर्ताकर्म प्रवृत्ति मटे छे अने कर्मबंध पण टळी जाय छे. तथा जे स्वभावना लक्षे परिणमतो नथी तेने अज्ञान छे, तेने कर्ताकर्मनी प्रवृत्ति छे अने नवो नवो कर्मबंध पण छे. आवी वात छे.

* गाथा ६९–७०ः भावार्थ उपरनुं प्रवचन *

‘आ आत्मा जेम पोताना ज्ञान-स्वभावरूप परिणमे छे तेम ज्यांसुधी क्रोधादिरूप पण परिणमे छे, ज्ञानमां अने क्रोधादिमां भेद जाणतो नथी, त्यांसुधी तेने कर्ताकर्मनी प्रवृत्ति छे.’