१८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
परिणमवानी पौद्गलिक कर्म-रजकणोनी लायकात छे तेथी स्वकाळे ते कर्मनी अवस्था थाय छे. जीवना शुभाशुभ परिणामने लईने नवुं कर्म बंधाय छे एम नथी. शुभाशुभ परिणाम तो बाह्य निमित्तमात्र छे. कर्म रजकणो पोतानी मेळे स्वतंत्र परिणमी जाय छे. अहो! समयसारनी टीका अद्भुत अने अजोड छे! आवी वात सांभळवा मळे ए जीवनुं महा सौभाग्य छे. अने तेनो भाव समजे ए तो न्याल थई जाय एवी आ चीज छे.
अहा! ज्ञानरूपे न परिणमतां रागरूपे परिणम्यो-ए तेनो स्वकाळ छे माटे रागरूपे परिणम्यो छे. कर्मनो उदय छे माटे रागरूपे परिणम्यो छे एम नथी. तथा ज्ञानरूपे परिणमतां कर्मनो अभाव थयो माटे कर्मनो अभाव थयो तेथी ज्ञानरूपे परिणम्यो एम पण नथी. ज्ञान अने आत्मा एक छे-एम जे ज्ञानमां पोतापणे वर्ततो परिणम्यो ते दर्शनमोहनो अभाव छे माटे परिणम्यो छे एम नथी. तथा दर्शनमोहनो उदय छे माटे मोहभावे परिणम्यो छे एम पण नथी. (बन्नेनी परिणमनधारा स्वतंत्र छे). निमित्त छे, बस एटली वात छे. परमाणुमां कर्मरूप अवस्था थवानो तेनो स्वकाळ छे तेथी पोतानी योग्यताथी कर्मरूप परिणमे छे.
जीवना विकारी भावने निमित्तमात्र करीने कर्म पोते पोताथी ज परिणमतुं त्यां एकठुं थाय छे. ‘आ रीते जीव अने पुद्गलनो परस्पर अवगाह जेनुं लक्षण छे एवा संबंधरूप बंध सिद्ध थाय छे.’ अहीं टीकामां त्रण प्रकारना संबंध कह्या-
१. ज्ञान अने आत्मानो तादात्म्यसिद्ध संबंध. २. राग अने आत्मानो संयोगसिद्ध संबंध. ३. कर्म अने आत्मानो परस्पर अवगाहसिद्ध संबंध.
वस्तुनो स्वभाव ज्ञान अने वस्तु ध्रुव आत्मा ए बेनो तादात्म्यसिद्ध संबंध छे अने तेमां अभेदभावे परिणमवुं ते धर्म छे.
राग अने आत्मानो संयोगसिद्ध संबंध छे छतां बेने एक मानीने परिणमवुं ते अज्ञान छे.
कर्म अने आत्मानो एक क्षेत्रावगाह संबंध छे. एटले के कर्म अने आत्मा परस्पर एक ज्ञेत्रमां व्यापीने संनिकट रहे एवा संबंधरूप बंध छे. जीवना परिणामनुं निमित्त पामीने कर्मना पुद्गलो एक क्षेत्रे अवगाहीने रहे छे तोपण भावथी तद्न जुदा छे. एक क्षेत्रे रहे छे तेने परस्पर अवगाह जेनुं लक्षण छे एवा संबंधरूप बंध कहेवाय छे.
हवे कहे छे-‘अनेकात्मक होवा छतां (अनादि) एक प्रवाहपणे होवाथी जेमांथी ईतरेतराश्रय दोष दूर थयो छे एवो ते बंध, कर्ताकर्मनी प्रवृत्तिनुं निमित्त जे अज्ञान तेनुं निमित्त छे.’