समयसार गाथा ६९-७० ] [ १७
परिणमतो नथी. हुं रागादिनो कर्ता छुं एम एने रागादिनुं स्वामित्व नथी. ए तो पर्यायमां थता रागादिने जाणवापणे ज परिणमे छे. जुओ! मुनिराज अमृतचंद्राचार्यने टीकाना काळमां टीका करवानो विकल्प उत्पन्न थयो छे, पण ते विकल्पना कर्तापणे परिणम्या नथी, पण सहज जाणवापणे-ज्ञातापणे परिणम्या छे. अहीं कहे छे के अज्ञानी सहज उदासीन जाणनक्रियानो त्याग करीने, रागमां एकत्व स्थापीने रागादि क्रियामां प्रवर्ते छे अने तेथी ते रागादिनो कर्ता छे. तेने ज्ञान प्रतिभासवाने बदले एकला रागादि ज प्रतिभासे छे अने तेथी रागादिमां प्रवर्ततो ते रागादिनो कर्ता छे. ‘अने ज्ञानभवनव्यापाररूप प्रवर्तनथी जुदां, जे क्रियमाणपणे अंतरंगमां उत्पन्न थतां प्रतिभासे छे एवां क्रोधादिक ते, (ते कर्तानां) कर्म छे.’ निर्मळ ज्ञानना परिणमनथी जुदा-विरुद्ध लक्षणवाळा जे पोताथी (हुं करुं छुं एवा अभिप्रायथी) कराय छे एवा अंतरंगमां उत्पन्न थता क्रोधादिक भाव ते मारां कर्म छे एम अज्ञानी माने छे. आत्मा कर्ता अने क्रोधादिक भाव ते मारुं कर्म-आ प्रमाणे अनादिकाळनी अज्ञानथी थयेली आ आत्मानी कर्ताकर्मनी प्रवृत्ति छे. अने आ ज संसारनुं कारण छे. आत्मा परनो अकर्ता छे, केमके ते परथी भिन्न छे. बीजाने सुधारवा-बगाडवा ए तो अज्ञानभावे पण आत्मानुं कर्म नथी. बापु! आ समज्ये ज छूटको छे हो. जोता नथी! क्षणवारमां देह छोडीने चाल्या जाय छे. भाई! आ समज्या विना ते कयां जशे? कयां उतरशे? स्वरूपने समज्या विना आ कर्ताकर्मनी प्रवृत्ति ऊभी ज रहे छे, अने त्यां सुधी जन्म-मरणनी परंपरा ऊभी ज रहे छे. स्वरूप समज्ये ज जन्म-मरणनो अंत आवे तेवो छे. हवे कहे छे-‘ए रीते पोताना अज्ञानने लीधे कर्ताकर्मभाव वडे क्रोधादिमां वर्तता आ आत्माने, ते ज क्रोधादिनी प्रवृत्तिरूप परिणामने निमित्तमात्र करीने पोते पोताना भावथी ज परिणमतुं पौद्गलिक कर्म एकठुं थाय छे.’ जुओ! आत्मा अज्ञानभावे क्रोधादिनो कर्ता थाय छे. त्यां ते क्रोधादि परिणामने निमित्तमात्र करीने पोताना भावथी ज पुद्गलकर्म बंधाय छे. निमित्तमात्र करीने-एम कह्युं छे. एनो अर्थ ए के निमित्तनी उपस्थिति छे, बस एटलुं ज. जीवने क्रोधादि भाव थाय छे माटे त्यां कर्म एकठुं थाय छे एम नथी. कर्म, कर्मना रजकणना सामर्थ्यथी बंधाय छे. रजकणमां परिणमवानुं सामर्थ्य छे. लख्युं छे ने के ‘पोते पोताना भावथी ज परिणमतुं पौद्गलिक कर्म एकठुं थाय छे.’ अहो! आ तो स्वतंत्रतानो ढंढेरो छे! आवी स्वतंत्रतानी वात दिगंबर धर्म सिवाय बीजे कयांय नथी. अरे! दिगंबरमां पण आ काळे एने समजनारा बहु अल्प जीवो छे! जीव अज्ञानवश शुभाशुभ विकारभावे परिणमे छे त्यारे ते वखते कर्मपणे