१६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
विकार ते हुं एम माने छे अने तेथी रागादि विकारमां पोतापणे वर्ते छे. पण भाई! राग ए तो झेर छे बापु! झेर पीतां पीतां अमृत (आत्मा)नो स्वाद न आवे, राग छे ए रोग छे अने राग मारो एवो मिथ्यात्वभाव महान रोग छे. कह्युं छे ने के ‘आत्म-भ्रान्ति सम रोग नहि, सद्गुरु वैद्य सुजाण.’ अनादिनो एने आत्मभ्रान्तिनो रोग लागु पडयो छे. तेने मटाडवानी आ वात चाले छे.
आत्मा अंतरमां स्वभावथी भगवान स्वरूपे बिराजे छे. तेने भूलीने अज्ञानी निःशंक रीते क्रोधादि विभावोमां पोतापणे वर्ते छे. ‘अने त्यां (क्रोधादिमां पोतापणे) वर्ततो ते, जोके क्रोधादि क्रिया परभावभूत होवाथी निषेधवामां आवी छे तोपण ते स्वभावभूत होवानो तेने अध्यास होवाथी क्रोधरूप परिणमे छे, रागरूप परिणमे छे, मोहरूप परिणमे छे.’
शुं कह्युं? क्रोधादि क्रिया परभावभूत होवाथी निषेधवामां आवी छे. व्यवहार रत्नत्रयना परिणाम, दया, दान, व्रतादिना परिणाम संयोगीभाव होवाथी परभावभूत छे. तेथी ते विकारी क्रिया निषेधवामां आवी छे. छतां ते रागनी क्रिया मारी पोतानी क्रिया छे एम मानवानो तेने चिरकाळथी अध्यास छे. अहा! राग छे ते मारो स्वभाव छे एम मानवानी अज्ञानीने टेव-आदत थई गई छे. तेथी जेम विष्टाना कीडाने फरी फरीने विष्टामां जवानी टेव पडी गई होय छे तेम अज्ञानीने वारंवार क्रोधरूपे, रागरूपे अने मोहरूपे परिणमवानी टेव पडी गई छे. ते प्रमाणे ते निःशंक क्रोधरूपे परिणमे छे, रागरूपे परिणमे छे, मोहरूपे परिणमे छे. आ रीते ते रागादिमां एकपणे परिणमतो मिथ्यात्वना भावरूपे परिणमे छे.
‘हवे अहीं, जे आ आत्मा पोताना अज्ञान भावने लीधे, ज्ञानभवनमात्र जे सहज उदासीन (ज्ञाता-द्रष्टा मात्र) अवस्था तेनो त्याग करीने अज्ञानभवन व्यापाररूप अर्थात् क्रोधादि व्यापाररूप प्रवर्ततो प्रतिभासे छे ते कर्ता छे.’ ज्ञानव्यापारथी भिन्न लक्षणवाळा पुण्य-पापना जे क्षणिक विकारो पर्यायमां थाय छे ए ज जाणे पोतानो स्वभाव होय एम अज्ञानी माने छे. आम रागादि विकारथी एकत्व माननारो अज्ञानी, ज्ञाताद्रष्टानी सहज उदासीन अवस्थाने छोडी दईने रागादि विकारनो कर्ता थाय छे. अहाहा....! वस्तुनो सहज चैतन्यस्वभाव तो एवो छे के एमांथी ज्ञाताद्रष्टानी सहज उदासीन निर्मळ अवस्था ज थाय विकारनी नहि, केमके वस्तुमां विकार छे ज कयां? ज्ञानभवनमात्र एटले जाणवुं, जाणवुं, जाणवुं-एम सहज जाणनरूप ज्ञाताद्रष्टाना परिणमननी क्रिया थवी जोईए. परंतु अज्ञान वडे तेनो त्याग करीने अज्ञानी क्रोधादि क्रियामां एकत्वपणे प्रवर्ते छे अने तेथी क्रोधादिमां प्रवर्ततो ते क्रोधादिनो कर्ता छे.
प्रश्नः- ज्ञानीने पण पर्यायमां रागादि थाय छे ने?