Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 787 of 4199

 

समयसार गाथा ६९-७० ] [ १प

शुभ भावो अने हिंसा, जूठ आदि अशुभ भावो-ए बधा संयोगी भावो छे केमके तेमनो वियोग थई जाय छे. आ क्रोधादि भावो साथे आत्मानो एक समय पूरतो ज संबंध छे. (एक समयमां तेओ नाश पामे छे) अने बीजा समये बीजा नवा उत्पन्न थाय छे, तथा आत्माना भान अने स्थिरता वडे तेओ अत्यंत मूळमांथी ज नाश पामी जाय छे. केवलज्ञान थतां विकारीभावो अत्यंत नाश पामी जाय छे. माटे क्रोधादि भावो आत्मा साथे उत्पाद-व्यय संबंधे छे पण ध्रुवसंबंधे नथी, एकरूप संबंधे नथी. दया, दान, इत्यादि शुभ परिणाम के पांच महाव्रतना शुभ परिणाम के व्यवहार रत्नत्रयना परिणाम ए बधा संयोगीभाव होवाथी तेमनो आत्मा साथे संयोगसिद्ध संबंध छे. वळी ते बधा भावो निमित्तना संगे उत्पन्न थयेला छे ने? तेथी पण ते संयोगी भावो छे. ज्ञान अने आत्माने स्वभावसिद्ध संबंध छे, एकरूपतानो संबंध छे. ज्ञान अने आत्मा एक छे. तेथी ज्ञानमां पोतापणे प्रवर्ततां ज्ञानी आत्माना मार्गे प्रवर्ते छे. त्यां आत्मानुं ज ज्ञान, आत्मानुं श्रद्धान अने आत्मानी रमणता-स्थिरता थाय छे अने ते धर्मनी क्रिया छे. प्रश्नः– ज्ञाननी पर्याय पण बदलाय तो छे? तेनो पण उत्पाद-व्यय तो थाय छे? उत्तरः– ज्ञाननी पर्याय (केवळज्ञाननी पण) बदलाय तो छे. तेनो पण उत्पाद-व्यय तो थाय छे. परंतु जेवो आत्मानो शुद्ध चैतन्यस्वभाव छे ते ज जातनो तेमां उत्पाद-व्यय थाय छे. बदलाय छे तोपण ज्ञाननी पर्याय चैतन्यस्वभावमय ज रहे छे. माटे ज्ञाननी निर्मळ पर्यायने आत्मा साथे स्वभावसिद्ध संबंध छे, तादात्म्यसंबंध छे. अहीं कहे छे के आत्मा अने क्रोधादि आस्रवोने संयोगसिद्ध संबंध छे छतां पोताना अज्ञानभावने लीधे ज्यां सुधी तेमनो एटले स्वभाव-अने विभावनो विशेष जाणतो नथी, भेद देखतो नथी त्यां सुधी ते अज्ञानी निःशंकपणे विकारीभावोमां-आस्रवोमां पोतापणे वर्ते छे. पुण्य-पापना भाव, दया, दान, व्रत आदिना शुभभाव अने आत्माने स्वभावसिद्ध संबंध नथी पण संयोगसिद्ध संबंध छे. पंचाध्यायीमां आ शुभाशुभ विकारी भावोने ‘आगंतुक’ कह्या छे. आगंतुक एटले (एक समय पूरता) नवा महेमान तरीके आवेला भाव कह्या छे. संयोगीभाव कहो के आगंतुक कहो-एक ज अर्थ छे. हवे ज्यां सुधी पोताना अज्ञानपणाने लीधे-कर्मने लीधे एम नहि पण पोताना अज्ञानने लीधे, रागादि विभावभावो अने अखंड एकरूप चैतन्यस्वभाव-ए बन्नेनो भेद अज्ञानी जाणतो नथी त्यां सुधी ते निःशंकपणे विभावमां-विकारमां पोतापणे वर्ते छे. अहाहा! आत्मानो स्वभाव तो शुद्ध चैतन्यमय अमृतस्वरूप छे. पण अज्ञानीने एनो कदी अनुभव नथी. तेथी ज्ञान ते हुं एम न जाणतां राग-