१४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
तेथी तेने आत्मा तिरोभूत थाय छे, अने पोताने पर अने राग जणाय छे एम ते माने छे. अज्ञानीने स्व उपर द्रष्टि नथी केमके ते पर्यायमां ज ऊभो छे.
अहीं कहे छे के-ज्ञानीने, वस्तुनो त्रिकाळी ध्रुव चैतन्यस्वभाव एना प्रति ढळतां जे निर्मळ ज्ञानपरिणति थई ते स्वाभाविक क्रिया छे, अने तेनो निषेध नथी माटे ते जाणे छे- जाणवारूप परिणमे छे अने ते धर्म छे. वस्तुस्वभाव ते धर्म एम कह्युं छे ने? वस्तुनो त्रिकाळी ध्रुव ज्ञायकस्वभाव ते धर्मी छे अने तेमां ढळेली धर्मीनी जे निर्मळ ज्ञानपरिणति ते धर्म छे, ते मोक्षमार्ग छे. ज्ञाननुं ज्ञानपणे परिणमवुं ते एनुं कर्म एटले कार्य छे.
प्रश्नः– ‘ज्ञानक्रियाभ्याम् मोक्षः’-अमे कह्युं छे ने?
उत्तरः– हा, भाई! ते बराबर छे, पण कयुं ज्ञान अने कयी क्रिया? शुं शास्त्रनुं परलक्षी ज्ञान ते ज्ञान छे? शुं व्रतादि मंद रागनुं आचरण ते क्रिया नाम चारित्र छे? ना, हो; भाई! एम नथी. आत्मज्ञान विना अगियार अंग अने नवपूर्वना ज्ञाननी लब्धि प्रगटी; पण ते ज्ञान नथी. वर्तमान ज्ञाननी पर्यायमां (स्वसंवेदनपूर्वक) आ त्रिकाळी ध्रुव भगवान आत्मा ते हुं-एम जे जणायो ते ज्ञान छे, आत्मज्ञान छे. तथा ए ध्रुव ज्ञायकमां एकाग्रता-रमणता थई ते क्रिया एटले चारित्र छे. आ ज्ञान अने क्रिया ते मोक्षनो मार्ग छे. एनी पूर्णता ते मोक्ष छे. आवी वात जाणे नहि अने मंडी पडे बाह्य व्रत-तप आदि क्रियामां तो तेथी मोक्ष न थाय. अज्ञानपूर्वकनां आचरण ए तो बंधमार्ग छे, भाई.
प्रश्नः– ज्ञानरूपे तो अज्ञानी पण हंमेशां परिणमे छे?
उत्तरः– ना, एम नथी. अज्ञानी एक समय पण ज्ञानपणे परिणमतो नथी. ए तो कह्युं ने के ज्ञाननी पर्यायमां ध्रुव ज्ञानस्वरूपी आत्मा जणाय छे, पण आ ध्रुव ज्ञान ते हुं- एम ते कयां जाणे अने माने छे? ए तो जे राग अने पर जणाय छे ए ज मारां ज्ञेय छे एम माने छे. परंतु राग अने परथी लक्ष दूर करीने द्रष्टि स्व भणी वाळतां ज्ञाननी पर्यायमां ‘आ ज्ञायक छे ते हुं छुं’-एम ज्ञायकने जाणवापणे अज्ञानी परिणमतो नथी.
हवे कहे छे-‘तेवी रीते ज्यां सुधी आ आत्मा, जेमने संयोगसिद्ध संबंध छे एवा आत्मा अने क्रोधादि आस्रवोमां पण, पोताना अज्ञानभावने लीधे, विशेष नहि जाणतो थको तेमनो भेद देखतो नथी त्यां सुधी निःशंक रीते क्रोधादिमां पोतापणे वर्ते छे.’
जुओ, गाथानो मूळ भाव हवे शरू थाय छे. शुं कहे छे? के क्रोध, मान, माया, लोभ इत्यादि शुभाशुभ भावो अने आत्माने संयोगसिद्ध संबंध छे. जेनो संयोग थईने वियोग थाय तेने संयोगसिद्ध संबंध कहेवाय. दया, दान, व्रत, भक्ति इत्यादि