समयसार गाथा ६९-७० ] [ १३
अद्भुत वातो करी छे! आवो अधिकार बीजे कयांय छे ज नहि. आ समयसार तो बेजोड- बेनमून ग्रंथ छे.
कर्म?
पोताना कारणे थाय छे त्यारे एमां पुद्गलकर्म निमित्त छे, बस.
अहीं कहे छे के आत्मानो स्वभाव जे शुद्ध चैतन्य ते तरफ ढळतां ज्ञाननी जे क्रिया थई ए निर्मळ परिणति छे. ए सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रनी दशा छे अने ते स्वभावभूत होवाथी निषेधवामां आवी नथी. अहाहा! द्रष्टि अंतर्मुख ढळतां ज्ञानमां एकाग्रतानी जे क्रिया थई ते स्वभावभूत छे. एटले जेवो स्वभाव छे ते जातनी ज क्रिया थई छे. तेथी ते निषेधी शकाती नथी.
केटलाक कहे छे के ‘क्रियानो लोप कर्यो, क्रियानो लोप कर्यो’ तेने अहीं कहे छे के- भाई! आ ज्ञानक्रियानो लोप नथी, आ ज्ञानक्रिया तो धर्मीने होय छे केमके ते स्वभावभूत छे. आत्मा अने ज्ञानमां विशेषता (तफावत) नथी-एम बन्नेमां जुदापणुं नहि देखतो थको धर्मी निःशंक रीते ज्ञानमां पोतापणे वर्ते छे. ज्ञानक्रिया जे थई ते स्वभावभूत छे तेथी निषेधी शकाती नथी.
गाथा १७-१८नी टीकामां आवे छे के-‘समस्त अन्य भावोनो भेद थवाथी निःशंक ठरवाने समर्थ थवाने लीधे आत्मानुं आचरण उदय थतुं आत्माने साधे छे.’ ‘आ अनुभूति छे ते ज हुं छुं-अहाहा....! ज्ञानमां जे अनुभूतिस्वरूप त्रिकाळी भगवान जणायो ते ज हुं छुं एम ज्ञानक्रियानी साथे ज श्रद्धाननो उदय थाय छे अने त्यारे दया, दान, व्रत, आदि समस्त परभावोनो भेद थवाथी स्वभावमां ठरवाने ते समर्थ थाय छे. आ प्रमाणे स्वरूपमां निःशंक ठरवाने लीधे ते आत्मानुं अनुष्ठान-आत्मानी रमणताने प्राप्त थाय छे. आ आत्मानी सिद्धिनी रीत छे, आ ज मोक्षमार्ग छे अने ते स्वभावभूत छे.
वळी त्यां ज (गाथा १७-१८नी टीकामां) आगळ कह्युं छे के आबाळगोपाळ सौने ज्ञाननी पर्यायमां जाणनारो-जाणकस्वभावी अनुभूतिस्वरूप भगवान आत्मा सदा जणाय छे, केमके ज्ञाननी पर्यायनो स्वपरप्रकाशक स्वभाव छे तेथी ते स्वने जाणे छे. परंतु एना (ज्ञायकस्वभावी आत्माना) उपर अज्ञानी जीवनी द्रष्टि नथी. तेथी हुं रागने अने परने ज जाणुं छुं एम अज्ञानी माने छे.
एकलुं ज्ञाननुं दळ एवो आत्मा ज सौने सदाकाळ जणाय छे. छतां रागने वश थयेलो अज्ञानी ‘आ अनुभूति छे ते हुं छुं’-एम ज्ञायक प्रति नजर करतो नथी.