१२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
जडनां काम आत्मा करे ए मान्यता मूढ मिथ्याद्रष्टिनी छे. जडनां कार्यो जडथी थाय, आत्माथी त्रणकाळमां नहि-आ वस्तुस्थिति छे. विश्वमां अनंत पदार्थो अनंतपणे एकबीजाथी पृथक्पणे रहेला छे ते एकबीजानुं(कार्य) करे तो अनंतता रहे नहि, पृथक्ता रहे नहि. अनंत आत्मा, अनंत पुद्गलो आदि विश्वमां अनंत द्रव्यो छे. ते सौ पोतपोताथी छे. द्रव्य-गुण तो पोताथी छे पण ते ते द्रव्योनी पर्यायो पण पोताथी छे. त्यारे ज ते अनंतपणे रहे छे. आत्मा अज्ञानपणे रागने करे अने ज्ञानपणे जाणवानी क्रिया करे. शरीर, वाणी, पैसा इत्यादि जडनी क्रिया आत्मा कदीय न करे-न करी शके. अहीं कहे छे के ज्ञान अने आत्माने जुदां नहि देखतो ज्ञानी निःशंकपणे ज्ञानमां वर्ते छे. ज्ञान अने आत्मा एक छे, माटे ज्ञानमां वर्ते छे ते आत्मामां वर्ते छे. जाणवुं, जाणवुं, जाणवुं एवो जे ज्ञानस्वभाव अने आत्मा बन्ने एक अभेद छे. तेथी रागनुं लक्ष छोडी दई जे ज्ञानमां वर्ते छे ते आत्मामां वर्ते छे, पोतामां वर्ते छे.
अने त्यां ज्ञानमां पोतापणे वर्ततो ते, ज्ञानक्रिया स्वभावभूत होवाने लीधे निषेधवामां आवी नथी माटे, जाणे छे-जाणवारूप परिणमे छे. ज्ञान ज्ञानमां-त्रिकाळी आत्मामां एकाग्र थयुं ते ज्ञाननी क्रिया छे. ज्ञान ते हुं एम जे ज्ञाननुं परिणमन थयुं ते ज्ञाननी क्रिया निषेधवामां आवी नथी. पर्याय स्वद्रव्य तरफ ढळतां जे ज्ञाननी क्रिया थई ते धर्म-क्रिया छे अने ते निषेधी नथी. परंतु परलक्षे जे रागनी क्रिया थई ते निषेधी छे.
त्रण प्रकारनी क्रियाः १. शरीर, मन, वाणी, धनादि जे जड परद्रव्य छे तेनी क्रिया ते जडनी क्रिया. २. पर-द्रव्यना लक्षे उत्पन्न रागनी क्रिया ते विभावरूप क्रिया. ३. स्वरूपना लक्षे उत्पन्न ज्ञाननी क्रिया ते स्वभावभूत क्रिया.
जडनी क्रिया तो आत्मा त्रण काळमां करतो नथी, करी शक्तो नथी. अने ज्ञान ते आत्मा-एम ज्ञानमां पोतापणे निःशंकपणे वर्ततो ते रागनी क्रियाने पण करतो नथी. ज्ञान ते आत्मा-एम स्वभावसन्मुख थई स्वानुभव करतां ते ज्ञानक्रिया करे छे. आमां द्रव्य-गुण- पर्याय त्रणे सिद्ध थई गयां. आ जाणवुं, जाणवुं, जाणवुं-एवो जेनो स्वभाव छे ते द्रव्य आत्मा, जाणवुं जे स्वभाव ते गुण. गुण अने गुणी बे एक अभिन्न छे-एम जे स्वलक्षे परिणमन थयुं ते ज्ञानक्रिया-पर्याय. आ ज्ञानक्रिया ते धर्म छे, मोक्षमार्ग छे.
ज्ञान ते आत्मा-एम स्व तरफ ढळतां जे स्वात्मप्रतीति थई ते श्रद्धान, स्वात्मज्ञान थयुं ते ज्ञान अने स्वात्मस्थिरता थई ते चारित्र. आ श्रद्धान-ज्ञान-चारित्रनी एकरूप परिणति ते मोक्षमार्ग छे. अहो! आ कर्ता-कर्म अधिकारमां आचार्योए