समयसार गाथा ६९-७० ] [ ११
कथन छे. भाई! वाणी तो स्वयं वाणीना कारणे नीकळे छे, आत्माना कारणे नहि. उपदेश वखते ज्ञानी एम जाणे छे के आ वाणी अमारी-आत्मानी नथी. वाणी जडनी छे.
वाणीमां स्वपरने कहेवानुं सामर्थ्य छे अने भगवान आत्मामां स्वपरने जाणवानुं सामर्थ्य छे. वाणीमां जे स्वपरने कहेवानुं सामर्थ्य छे ते आत्माथी थयुं छे एम नथी.
ज्ञानी धर्मात्मा अज्ञानीने व्यवहार द्वारा समजावे छे. त्यां अज्ञानी व्यवहारने ज चोंटी पडे छे. ते कहे छे-तमे अमने समजावो छो, तो समजावाथी अमे समजीए एम मानीने समजावो छो के नहि? तमे उपदेश करो छो, तो अमने ज्ञान थाय ए माटे करो छो के खाली एम ने एम करो छो? जो उपदेशथी-निमित्तथी कांई न थाय तो तमे मौन रहोने? सौ पोतपोतानी मेळे समजी जशे.
समाधानः– भाई! कोई कोईने समजावी दे ए वस्तुनुं स्वरूप ज नथी, ए तो व्यवहारनी कथन शैली छे. उपदेश तो सौ सांभळे छे पण जे स्वयं विकल्परहित थई अंतर्मुख थवानो उद्यम करे छे ते समजे छे, अन्य नहि. उपदेश सांभळीने पण जे समजे छे ते पोते पोताथी पोताना कारणे समजे छे अने बीजो मौन होय ते वेळा जे समजे छे ते पण पोते पोताथी समजे छे. दरेक वखते समज तो अंदरथी आवे छे, बाह्य उपदेशथी के मौनथी नहि.
प्रश्नः– तो धवलमां एम आवे छे के-ज्ञान कर्ता अने वाणी कर्म-एनो शुं आशय छे?
उत्तरः– भाई! ए तो निमित्तनुं कथन छे. निमित्त कर्ता तरीके कहेवाय, पण एनो अर्थ ए छे के ते कर्ता छे ज नहि. बापु! आत्महित करवुं होय तो वादविवाद छोडीने (स्याद्वाद शैली वडे) समजे तो समजाय एवुं छे. ‘भगवान आम कहे छे’ ए तो व्यवहारथी कहेवामां आव्युं छे, भगवान वाणीना कर्ता यथार्थमां छे ज नहि.
‘जेम आ आत्मा, जेमने तादात्म्यसिद्ध संबंध छे एवा आत्मा अने ज्ञानमां विशेष (तफावत, जुदां लक्षणो) नहि होवाथी तेमनो भेद (जुदापणुं) नहि देखतो थको, निःशंक रीते ज्ञानमां पोतापणे वर्ते छे.’
पाठमां (गाथामां) प्रथम बीजी वात छे. अहीं टीकाकार प्रथम सवळेथी शरू करे छे. कहे छे-भगवान आत्मा अने ज्ञान ए बेमां जुदाई नथी. ज्ञान अने आत्मा बन्ने तादात्म्यपणे एकरूप छे. ज्ञानस्वभाव अने आत्मा एक ज वस्तु छे, बन्नेमां तफावत नथी. तेमनां लक्षणो जुदां नथी. धर्मी जीव, सम्यग्द्रष्टि जीव तेमने जुदां नहि देखतो थको निःशंकपणे ज्ञानमां पोतापणे वर्ते छे, एटले के आत्मामां पोतापणे वर्ते छे.