१० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
कहे छे के अंदर ज्यां ज्ञानस्वभावी शुद्ध आत्माने ग्रह्यो त्यां ज्ञानी-धर्मी एम जाणे छे के हुं अत्यंत धीर छुं, अनाकुळ आनंदरूप छुं. आ जैनधर्म छे.
द्रव्योने प्रकाशवानो जेनो स्वभाव होवाथी ‘विश्वम् साक्षात् कुर्वत्’ समस्त लोकालोकने साक्षात् करे छे-प्रत्यक्ष जाणे छे. शुं कह्युं? के ज्ञातास्वभावना आश्रये जे ज्ञानपर्याय प्रगटी तेनो स्वभाव जुदां जुदां द्रव्योने प्रकाशवानो छे. ज्ञाननो सविकल्प स्वभाव छे. एटले जेटलां (अनंत) द्रव्य- गुण-पर्याय छे ते सर्वने भिन्नभिन्नपणे जाणे एवो एनो स्वभाव छे. केवळज्ञाननी पर्यायमां के श्रुतज्ञाननी पर्यायमां परनी सहाय विना जुदां जुदां द्रव्योने-द्रव्य-गुण-पर्याय-बधांने प्रकाशवानो स्वभाव छे. अहीं कहे छे के अपरिमित स्वभावथी भरेली शुद्ध चैतन्यप्रकाशमय वस्तु जे आत्मा-एमां ढळतां ज्ञानमां एवुं सामर्थ्य प्रगट थयुं के ते द्रव्यने-स्वने जाणे अने लोकालोकने पण जाणे. ज्ञाननी पर्यायनो आवो स्वपरप्रकाशक स्वभाव पोताथी छे. अहो! करे नहि कोईनुं (परिणमन) अने जाणे सौने-लोकालोकने एवो ज्ञानस्वभावी आत्मा छे.
‘आवो ज्ञानस्वरूप आत्मा छे ते, परद्रव्य तथा परभावोना कर्तापणारूप अज्ञानने दूर करीने, पोते प्रगट प्रकाशमान थाय छे.’ जुओ, शरीर, मन, वाणी, कुटुंब, देश इत्यादिनुं हुं करुं ए कर्तापणानुं अज्ञान छे. देहने आम सद्-उपयोगमां वाळुं, लक्ष्मीनो सदुपयोग करुं, देशने सुधारी दउं, दानादि वडे पुण्य उपजावुं इत्यादि प्रवृत्ति ए कर्तापणानुं अज्ञान छे. ज्ञानस्वरूपी भगवान आत्मा आवा अज्ञानने दूर करीने पोते प्रगट प्रकाशमान थाय छे. पोते एटले परनी अपेक्षा विना, रागनी मंदतानी अपेक्षा विना, व्यवहारनी अपेक्षा विना, भेदना लक्ष विना अभेद एक निर्मळ ज्ञानस्वभावना लक्षे ज्ञानज्योति प्रगट प्रकाशमान थाय छे. आ कळशनो भावार्थ छे.
हवे, ज्यां सुधी आ जीव आस्रवना अने आत्माना विशेषने (तफावतने) जाणे नहि त्यां सुधी ते अज्ञानी रह्यो थको, आस्रवोमां पोते लीन थतो, कर्मोनो बंध करे छे एम गाथामां कहे छेः-
अहा! कुंदकुंदाचार्यदेव गाथाओमां कहे छे के सर्वदर्शी-सर्वज्ञ भगवान आम कहे छे.
प्रश्नः– जो भगवान कहे छे तो भगवान वाणीना कर्ता छे के नहि?
उत्तरः– परमार्थे भगवान वाणीना कर्ता नथी. वाणी तो जड छे. एनो कर्ता आत्मा नथी. भगवान आम कहे छे एम जे अहीं कह्युं छे ए तो व्यवहार नयनुं