Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा ६९-७० ] [

अहाहा....! आ ज्ञानज्योति अत्यंत धीर छे. गमे तेवा प्रतिकूळ संजोगो होय तोपण एमां मुंझवण नथी, आकुळता नथी. ज्ञानज्योति प्रगट थतां धर्मी जीव एम जाणे छे के हुं परनुं कांई (परिणमन) करी शकुं नहि तथा पर मारुं कांई (परिणमन) करी शके नहि. प्रत्येक परिणमनने जाणवानो मारो स्वभाव छे, बदलवानो नहि. आवी ज्ञानज्योति प्रगट थतां अज्ञानभावे जे कर्ताकर्मनी प्रवृत्ति थती हती ते सहेजे दूर थई जाय छे, अने निराकुळ आनंद प्राप्त थाय छे.

प्रश्नः– शास्त्रोमां एम आवे छे के जेटलुं रागनुं परिणमन थाय तेटला परिणमननो हुं कर्ता छुं एम ज्ञानी जाणे छे. तो आ केवी रीते छे?

उत्तरः– भाई! ए ज्ञानप्रधान कथन छे. सम्यग्ज्ञान थया पछी धर्मी जाणे छे के जेटलुं रागनुं परिणमन छे ए मारा पोताना (पर्यायरूप) अस्तित्वमां छे अने ते मारे लईने छे, एमां परनी साथे शुं संबंध छे? आम ते ज्ञानमां जाणे छे. परंतु द्रष्टिना विषयनी अपेक्षाए रागनुं कर्तृत्व त्रिकाळी ज्ञानस्वरूप द्रव्यमां छे ज नहि. त्रिकाळी द्रव्यस्वभावमां राग के रागनुं कर्तापणुं छे ज नहि. आवा त्रिकाळी शुद्ध आत्मद्रव्यने जाणनारी ज्ञाननी पर्याय, पर्यायमां अंशे रागादि छे एने पण जाणे छे, अने ते पोतानुं कार्य छे, परिणमन छे अने पोते एनो कर्ता छे एम व्यवहारे जाणे छे.

भाई! निश्चयथी विकारनुं कर्ता-कर्मपणुं ज्ञानीने नथी; तथापि पर्याय अपेक्षाए व्यवहारथी ते वर्तमान विकारनो कर्ता-भोक्ता छे. ज्यां जे अपेक्षाथी कथन होय ते अपेक्षा लक्षमां लई तेनो भाव बराबर समजवो जोईए.

विकार थवामां परद्रव्यनी साथे शुं संबंध छे? परद्रव्य तो पोताथी तद्न भिन्न छे. पर्यायमां जे विकार थयो ते पोतानो ज अपराध छे. तथापि ते करवा लायक छे एवी बुद्धि ज्ञानीने छूटी गई छे. पर्यायमां परिणमन छे ए अपेक्षाए त्यां व्यवहारथी कर्ता कहेवामां आवे छे, पण स्वभाव द्रष्टिए एनुं स्वामित्व ज्ञानीने नथी. (ए अपेक्षाए ज्ञानी रागनो अकर्ता छे.)

आत्मामां विकारने-रागने न करे एवो अकर्ता नामनो गुण छे. दया, दान, व्रत, भक्ति आदिना रागने न करे एवी आत्मामां अकर्तृत्व नामनी शक्ति छे. ज्ञानमां ज्यां ज्ञायकभावने पकडयो त्यां शुभाशुभ विकारभावोनुं कर्तापणुं मटी जाय छे; आ अकर्तृत्व शक्तिनुं निर्मळ परिणमन छे. आ प्रमाणे ज्ञायकना लक्षे उत्पन्न थयेली ज्ञानज्योति अज्ञानरूप कर्ता-कर्मनी प्रवृत्तिने बधी तरफथी मटाडी दे तेवी धीर छे, अनाकुळ छे. भाई! आवी जैनधर्मनी सूक्ष्म वात दिगंबर धर्म सिवाय बीजे कयांय नथी, अने आ ज वात सत्य छे. लोकोए बहारथी कल्प्यो छे एवो जैनधर्म छे ज नहि. अहीं