Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४

आ बधुं करवुं, करवुं, करवुं, -एवो जे भाव छे ते राग छे, अने राग मारो ए मान्यता मिथ्या दर्शन छे. आ मिथ्यादर्शनयुक्त जे कर्ताकर्मनी प्रवृत्ति छे तेने ज्ञानज्योति मटाडे छे. केवी छे ते ज्ञानज्योति? तो कहे छे-त्रिकाळी ज्ञानानंदरूप स्वरूपलक्ष्मी ते आत्मस्वभाव छे अने ते परम उदात्त छे. आवा द्रव्यस्वभावमां अभेद थई, अर्थात् एमां ढळीने एकाग्र थई जे निर्मळ ज्ञानपरिणति प्रगट थई ते एम जाणे छे के हुं परम उदात्त छुं, पूर्णानंदनो नाथ, परम उत्कृष्ट पदार्थ छुं अहाहा....! ज्ञानीने पोतानी वर्तमान अल्पज्ञ दशामां हुं सर्वज्ञस्वभावी परिपूर्ण आत्मद्रव्य छुं एम जणाय छे अने एम ते माने छे.

अरे! लोकोने आवी वात सांभळवा मळे नहि एटले बिचारा शुं करे? बहारनी प्रवृत्ति अने क्रियाकांडना कर्तृत्वना फंदमां फसाई जाय छे. दया करो, दान करो, तप करो इत्यादि करो-करो-करो एम करवाना-कर्तृत्वना फंदमां फसाई जाय छे. परंतु बापु! करवुं ए तो वस्तुना (आत्माना) स्वरूपमां ज नथी. (केमके आत्मा तो सर्वज्ञस्वभावी छे). अहाहा....! जेमां बेहद ज्ञानस्वभाव तिरछो (तिर्यक्, सर्व प्रदेशे) भर्यो पडयो छे, एवो आनंद, एवी श्रद्धा, एवी कर्ता-कर्म-करण इत्यादि अनंत अपरिमित्त शक्तिओनो जे भंडार छे ते परमानंदनो नाथ प्रभु आत्मा छे. आवा आत्माने अंतर्मुख थई अंदरथी पकडतां- ग्रहतां जे ज्ञानज्योति प्रगट थई एमां ज्ञानीए जाण्युं के हुं परम उदात्त छुं, उदार छुं, स्वाधीन छुं, कोईने आधीन नथी. अहाहा....! वस्तु (आत्मा) स्वाधीन अने तेने ग्रहनारी- जाणनारी ज्ञानज्योति पण (परनी अपेक्षा रहित) स्वाधीन!

आवुं वस्तुस्वरूप भूलीने रागादि क्रियानो ज्यां सुधी कर्ता थाय त्यां सुधी जीव अज्ञानी छे, मिथ्याद्रष्टि छे. अज्ञानभावे ते विकारनो-दोषनो कर्ता छे. विकारनो कर्ता कोई जड कर्म छे एम नथी. परंतु वस्तुस्वरूपना अभानमां अज्ञानी जीव विकारनो कर्ता छे. आ बधी अज्ञानमय कर्ताकर्मनी प्रवृत्तिने बधी तरफथी शमावती जे ज्ञानज्योति प्रगट थई ते परम उदात्त छे, स्वाधीन छे एनी वात थई.

वळी केवी छे ते ज्ञानज्योति? तो कहे छे-‘अत्यन्त धीरं’ अत्यंत धीर छे अर्थात् कोई प्रकारे आकुळतारूप नथी. अज्ञानीओ परनां कार्यो करवामां अने परनुं परिणमन बदलवाना विकल्पोमां घणी बधी आकुळता करे छे. कुटुंबनुं आ करुं अने समाजनुं आ करुं-एम कुटुंबनां, समाजनां, देशनां कार्यो करवाना विकल्पोथी तेओ खूब आकुळ-व्याकुळ थता होय छे. परंतु भाई! एक रजकण पण बदलवानुं तारुं-आत्मानुं सामर्थ्य नथी. तारो तो ज्ञ-स्वभाव छे अने तेना आश्रये उत्पन्न थयेली ज्ञानज्योति धीर छे, अनाकुळस्वरूप छे, अत्यंत आनंदरूप छे. चैतन्यमय ज्ञानज्योति साथे अतीन्द्रिय आनंद पण भेगो ज छे.