समयसार गाथा ६९-७० ] [ ७
मान छे; पुण्य-पाप आदि पर पदार्थोना प्रेमनी आडमां चैतन्यस्वभावमय निज आत्मानो ईन्कार करवो ते अनंतानुबंधी माया छे तथा स्वभावने भूलीने पुण्य-पाप आदि पर पदार्थोनी अभिलाषा-वांछा करवी ते अनंतानुबंधी लोभ छे.
अहाहा....! निर्मळानंदनो नाथ भगवान आत्मा शुद्ध चैतन्यनो दरियो छे. तेने द्रष्टिमां न लेतां हुं एक कर्ता छुं अने अंदर जे पुण्य-पापना क्रोधादि विकार थाय छे ते मारुं एकनुं (एक स्वभावी आत्मानुं) कर्तव्य छे एवी जे मान्यता छे ते अज्ञान छे, मिथ्यादर्शन छे.
अहीं कहे छे के आ लोकमां अनादिथी अज्ञानीओने आ अज्ञानमय कर्ताकर्मप्रवृत्ति छे. दया, दान, व्रत, तप, आदि शुभ परिणाम अने हिंसादि अशुभ परिणाम-एम शुभाशुभ परिणामोनो हुं कर्ता छुं अने ते मारां कार्य छे, कर्तव्य छे-एवी अज्ञानीओनी कर्ताकर्मनी प्रवृत्ति छे.
आ जे अज्ञानमय कर्ताकर्मप्रवृत्ति छे तेने ‘अभितः शमयत्’ बधी तरफथी शमावती (मटाडती) ‘ज्ञानज्योतिः’ ज्ञानज्योति ‘स्फुरति’ स्फुरायमान थाय छे.
अहाहा....! आ शरीर, मन, वाणी, इन्द्रिय इत्यादि पर पदार्थोनी अवस्था तो मारां कार्य नथी पण अंदर जे पुण्य-पापना शुभाशुभ भावो थाय छे ते पण मारां कार्य-कर्तव्य नथी. एम सर्व परभावोथी भिन्न पडी ज्यां निर्दोष, पवित्र चैतन्य-स्वभावमां एकाग्र थयो त्यां कर्ता-कर्मनी प्रवृत्तिने मटाडती ज्ञानज्योति प्रगट थाय छे. जे भावे सर्वार्थसिद्धनो भव मळे के जे भावे तीर्थंकरगोत्र बंधाय ते भाव मारुं-आत्मानुं कार्य नथी. भाई! स्वभावनी द्रष्टिमां सर्व शुभाशुभ विकल्पोनुं स्वामित्व सहज छूटी जाय छे. अहाहा....! इन्द्र-अहमिंद्रादि पद के चक्रवर्तीपद इत्यादि बधुं धूळ छे, परमाणुनुं कार्य छे, आत्मानुं नहि. आम बधी तरफथी कर्ता-कर्मनी प्रवृत्तिने मटाडती ज्ञानज्योति प्रगट थाय छे.
हवे कहे छे-केवी छे ते ज्ञानज्योति? ‘परम–उदात्तम्’ परम उदात्त छे अर्थात् कोईने आधीन नथी. अहाहा....! सहज ज्ञान अने आनंदनी लक्ष्मीवाळो मारो अपरिमित-बेहद ज्ञानानंदस्वभाव छे ते परम उदात्त छे, स्वाधीन छे. आम ज्ञानी ज्ञानमां पोताने जाणतो कर्ता-कर्मनी प्रवृत्तिने मटाडी दे छे. ज्ञानानंदस्वभावी आत्मानुं जेने भान नथी एवो अज्ञानी कर्मने आधीन थईने-विकारी भावने पोतानो मानीने रागनो-विकारनो कर्ता थाय छे. स्वाधीनपणे विकारनो नाशक मारो स्वभाव छे एनुं एने भान नथी. अहीं कहे छे के परम उदात्त जे आत्मा ज्ञानानंदस्वभावमय वस्तु-तेने लक्ष करीने, तेनी सन्मुख झुकीने वा तेमां ढळीने जे स्वाधीन ज्ञानपरिणति प्रगट थई ते परम उदात्त छे, स्वाधीन छे, पराधीन नथी. परनी के रागनी तेने अपेक्षा नथी.