Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 778 of 4199

 

] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४

अलंकार कर्यो छे. आ समयसार नाटक छे ने? जीव-अजीव छे तो बन्नेय भिन्न-भिन्न, परंतु बन्नेय जाणे एक होय तेम कर्ताकर्मनो स्वांग रचीने प्रवेश करे छे.

कर्ताकर्मनो स्वांग एटले हुं आत्मा कर्ता अने आ रागादि भाव ते मारुं कर्म-एम स्वांग रचीने प्रवेश करे छे. आ स्वांग जूठो छे केमके आत्मा चैतन्यप्रकाशनो पुंज, एकला ज्ञाननो रसकंद प्रभु ते दया, दान आदि विकारी परिणामने केम करे? ए तो सर्वने जाणे- बंधने जाणे, उदयने जाणे, निर्जराने जाणे अने मोक्षने जाणे-एवो ज्ञानस्वरूपी भगवान छे. (जुओ समयसार गाथा ३२०) तथापि हुं कर्ता अने रागादि अचेतन विकार ते मारुं कर्म एम अज्ञानीने भासे छे. अहाहा! हुं अखंड एक ज्ञायकस्वभावी आत्मा छुं-एवो जे विकल्प ऊठे तेनो कर्ता अज्ञानी थाय छे, ज्ञानी नहि. शुभाशुभ बन्नेय भावनो अज्ञानी कर्ता थाय छे, ज्ञानी नहि.

हवे प्रथम, ते स्वांगने ज्ञान यथार्थ जाणी ले छे तेथी ते ज्ञानना महिमानुं काव्य कहे छेः ते स्वांगने ज्ञान यथार्थ जाणी ले छे एटले जे समये अवस्थामां राग छे ते समये ज्ञाननी पर्याय स्वने स्वपणे अने रागने परपणे जाणवारूपे ज प्रगट थाय छे. अहाहा....! रागनो कर्ता तो जीव नथी, पण राग छे माटे रागसंबंधी ज्ञान थयुं छे एम पण नथी. रागनुं ज्ञान ए तो कथनमात्र छे. ज्ञाननुं ज्ञान छे अने ते ज्ञान आत्मानुं कर्म छे, राग आत्मानुं कर्म नथी अने ज्ञान रागनुं कर्म नथी. अहाहा! आम स्वांगने यथार्थ जाणनारुं ज्ञान ते ज्ञानना महिमानुं कळशरूप काव्य कहे छेः-

कळश ४६ः श्लोकार्थ उपरनुं प्रवचन

आ कर्ताकर्म अधिकारनो पहेलो कळश छे. शुं कहे छे एमां? के-‘इह, ’ आ लोकमां ‘अहम् चिद्’ हुं चैतन्यस्वरूप आत्मा तो ‘एकः कर्ता’ एक कर्ता छुं अने ‘अमी कोपादयः’ आ क्रोधादि भावो ‘मे कर्म’ मारां कर्म छे ‘इति अज्ञानाम् कर्तृकर्म–प्रवृत्तिम्’ एवी अज्ञानीओनी जे कर्ताकर्मनी प्रवृत्ति छे तेनेः शुं कह्युं? अज्ञानी एम माने छे के हुं कर्ता अने आ क्रोधादि मारां कर्म छे. क्रोधादि कह्यां एमां प्रथम क्रोध केम लीधो? कारण के मुनिराज छे ते (क्रोधना अभावपूर्वक) उत्तमक्षमाना भंडार छे. अहाहा....! मुनिराज तो चैतन्यस्वभावमय भगवान आत्मानी रुचि अने रमणताना स्वामी छे. भाई! आत्मा शुद्ध चिदानंदमय अखंड एकरूप वस्तु छे. तेनो जेने प्रेम नथी, रुचि नथी तेने पोताना आत्मा प्रति क्रोध छे. द्वेष अरोचक भाव. स्वभावनी अरुचि-अणगमो ते अनंतानुबंधी क्रोध छे. पुण्य-पापना भावो अने देव-शास्त्र-गुरु इत्यादि पर पदार्थोनी रुचि अने स्वस्वरूपनी अरुचि ते आत्मा प्रत्येनो द्वेष छे अने ते अनंतानुंबंधी क्रोध छे. तेवी रीते पुण्य-पाप आदि पर पदार्थोमां अहंबुद्धि थवी ए अनंतानुबंधी