Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ क्रोधादिकमां ज्ञान नथी. आवुं तेमनुं भेदज्ञान थाय त्यारे तेमना एकपणारूप अज्ञान मटे अने अज्ञान मटवाथी कर्मनो बंध पण न थाय आ रीते ज्ञानथी ज बंधनो निरोध थाय छे.

हवे पूछे छे के आ कर्ताकर्मनी प्रवृत्तिनो अभाव कयारे थाय छे? तेनो उत्तर कहे छेः-

* * *

* गाथा ७१ः टीका उपरनुं प्रवचन *

‘आ जगतमां वस्तु छे ते स्वभावमात्र ज छे, अने ‘स्व’नुं भवन ते स्वभाव छे. (अर्थात् पोतानुं जे थवुं-परिणमवुं ते स्वभाव छे); माटे निश्चयथी ज्ञाननुं थवुं-परिणमवुं ते आत्मा छे अने क्रोधादिकनुं थवुं-परिणमवुं ते क्रोधादि छे.’

जुओ! आ वस्तुनी व्याख्या कही. वस्तु छे ते स्वभावमात्र ज छे. एटले जेटलो स्वभाव छे तेटली ज वस्तु छे. जेटलो विकार छे ते परमार्थ वस्तु-आत्मा नथी. अहाहा....! जे भावे सर्वार्थसिद्धिनुं पद मळे के जे भावे तीर्थंकर नामकर्म बंधाय ते भाव आत्मा नथी एम अहीं कहे छे. स्वभावमां पण वस्तु तो नथी पण आ जे क्रोधादिनुं थवुं-परिणमवुं छे ते पण वस्तु नथी, आत्मा नथी.

‘स्व’नुं भवन ते स्वभाव छे. पोतानुं जे थवुं-परिणमवुं ते स्वभाव छे. आ सिद्धांत कह्यो. माटे निश्चयथी ज्ञाननुं थवुं-परिणमवुं ते आत्मा छे. अहाहा....! निश्चयथी ज्ञाननुं थवुं एटले जेवो ज्ञानस्वभाव छे ते-रूपे परिणमवुं ते आत्मा छे. सम्यग्दर्शनपणे, सम्यग्ज्ञानपणे, सम्यक्चारित्रपणे, अतीन्द्रिय आनंदपणे परिणमवुं ते आत्मा छे. आत्मा निर्मळ ज्ञान- श्रद्धान-शान्तिपणे परिणमे ते आत्मा छे.

प्रश्नः- तो नियमसारमां शुद्धभाव अधिकारनी गाथा ३८ मां तो एम आवे छे के त्रिकाळी ध्रुव चैतन्यस्वभावमय वस्तु छे ते आत्मा छे. त्यां संवर, निर्जरा अने मोक्षनी पर्यायने तो हेय कहीने ते आत्मा नथी एम कह्युं छे. आ केवी रीते छे?

उत्तरः– भाई! त्यां नियमसारमां अपेक्षा जुदी छे. त्यां तो ध्यातानुं जे ध्येय, जे सम्यग्दर्शननो विषय त्रिकाळी शुद्धभाव, शुद्ध चैतन्यमय वस्तु छे ते बताववानुं प्रयोजन छे. त्रिकाळी शुद्ध वस्तु, अविनाशी आत्मा ते एकना आश्रये ज सम्यग्दर्शन आदि धर्म थाय छे माटे तेने उपादेय कह्यो. ज्यारे पर्याय तो क्षणविनाशी छे अने तेना आश्रये सम्यग्दर्शन थतुं नथी पण विकल्प थाय छे तेथी संवर, निर्जरा, मोक्षनी पर्यायने त्यां (आश्रय करवा माटे) हेय कही. वळी त्रिकाळी ध्रुव द्रव्यमां पर्याय नथी तेथी ते (निर्मळ पर्याय) आत्मा नथी एम कह्युं छे. ज्यारे अहीं तो कर्तानुं कर्म बताववानी वात छे. एटले कहे छे के वस्तु रागपणे न परिणमतां स्वभावपणे-ज्ञानपणे परिणमे ते आत्मा