समयसार गाथा ७१] [ २प छे. रागनुं थवुं, रागपणे परिणमवुं ते आत्मा नहि. आत्मा तो शुद्ध ज्ञानानंदस्वभावी वस्तु छे. माटे निर्मळ ज्ञान-आनंदपणे परिणमवुं ते आत्मा छे. जेवो आत्मानो स्वभाव छे ते-रूपे तेना परिणमननी दशा थाय ते आत्मा छे. जेवी शुद्ध चैतन्यमय वस्तु छे तेवुं (शुद्ध चैतन्यमय) परिणमन थवुं ते कर्तानुं कर्म छे एम अहीं वात छे.
दया, दान, व्रत आदि शुभरागना विकारी परिणाम ते मारुं कर्म अने हुं तेनो कर्ता- एम अज्ञानी माने छे. ज्ञानी तो कहे छे के ज्ञानस्वभावना लक्षे जे निर्मळ ज्ञानरूपे परिणमन थयुं ते मारुं कर्म छे, राग थाय ते मारुं कर्म नहि. आवो वीतरागनो मार्ग बहु झीणो छे. परंतु लोकोए बहारथी क्रियाकांडने ज धर्म मान्यो छे. घणाने एम थाय के आ तो व्यवहारनो लोप थाय छे, परंतु अहीं तो स्पष्ट कहे छे के रागभाव ए तारा स्वरूपमां नथी अने तेने तुं तारुं कार्य माने ए अज्ञान छे.
ज्ञाननुं थवुं-परिणमवुं ते आत्मा छे अने क्रोधादिकनुं थवुं-परिणमवुं ते क्रोधादि छे. स्वभावने भूलीने पुण्य-पापना विकारी भावरूपे थवुं ए विकार छे, आत्मा नथी. शुभरागरूपे परिणमवुं ए स्वभाव प्रत्येना विरोधवाळो भाव क्रोध छे. एवा क्रोधपणे थयो ते आत्मा नथी, अनात्मा छे. जगतनी वातोथी घणो फेर छे. जगत माने के न माने वात तो आ ज सत्य छे. जगत तो अनादिथी ऊंधे रस्ते छे.
‘वळी ज्ञाननुं जे थवुं-परिणमवुं छे ते क्रोधादिकनुं पण थवुं-परिणमवुं नथी, कारण के ज्ञानना थवामां (परिणमवामां) जेम ज्ञान थतुं मालूम पडे छे तेम क्रोधादिक पण थतां मालूम पडतां नथी.’
शुं कह्युं? ज्ञानस्वरूपी भगवान आत्मा ज्ञानरूपे परिणमे ते वखते विकारपणे पण परिणमे एम नथी. अहाहा....! शुद्ध चैतन्यस्वभाव प्रति ढळीने चैतन्यनी रुचिपूर्वक जेने अंतर-परिणमन थयुं तेने रागादि-क्रोधादिनी रुचि नथी. एक म्यानमां बे तलवार रही शक्ती नथी. धर्मी जीव ज्ञानस्वभावना प्रेमपणे परिणमे ते वखते रागना प्रेमपणे पण परिणमे एम बीलकुल होई शके नहि.
स्वभावपणे परिणमन थवुं ते ज्ञानीनुं कर्म अने रागपणे परिणमन थवुं ते अज्ञानीनुं कर्म छे. परनुं करवुं ए वात तो छे ज नहि. परनुं कार्य तो कोई करी शक्तो ज नथी. आवुं धर्मनुं तत्त्व घणुं सूक्ष्म छे. भाई! जेने विकल्पनो द्वंद्व छूटी, स्वभावना आश्रये निर्विकल्प निर्विकारी ज्ञाननुं परिणमन थवुं ते धर्म छे. अहाहा....! मुनिदशामां तो त्रण कषायनो अभाव थई अंदर अतीन्द्रिय आनंदनी लहेर ऊठती होय छे, अने बहारमां सहज नग्न दशा होय छे. अंदर कषायथी नग्न अने बहार वस्त्रथी नग्न-एवी शुद्ध चैतन्यना आनंदमां झूलती मुनिदशा कोई अलौकिक चीज छे, बापु!