२६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
आत्मानो चैतन्यस्वभाव अरूपी अतिसूक्ष्म छे. दया, दान, व्रत, भक्ति आदि शुभरागना परिणामने पुण्य-पाप अधिकारमां स्थूळ कह्या छे. जे पोताना सूक्ष्म स्वभावे परिणमे तेने आत्मा कहीए, अने राग-द्वेषना स्थूळ विकारपणे परिणमे तेने आत्मा नहि एटले अनात्मा कहीए. अहीं कहे छे के जे चैतन्यस्वभावे-आत्मभावे परिणमे ते साथे रागादि अनात्मभावे पण परिणमे एम बनी शके नहि.
प्रश्नः– ज्ञानीने पण रागादि तो होय छे?
उत्तरः– हा, साधकदशामां ज्ञानीने पण राग होय छे, पण ज्ञानपणे परिणमता ज्ञानीना ज्ञानपरिणमनथी ते राग भिन्न रही जाय छे. जे राग थाय तेने जाणवापणे एटले के तेना ज्ञातापणे ज्ञानी परिणमे छे. कर्तापणे नहि. जे राग आवे तेने जाणतो ज्ञानी ज्ञानरूपे परिणमे छे पण रागरूपे परिणमतो नथी. ज्ञानीने जे राग थाय तेनां एने रुचि अने स्वामित्व नथी.
ज्ञाननुं परिणमवुं ते क्रोधादिनुं परिणमवुं नथी. कारण? कारण के ज्ञानना थवामां जेम ज्ञान थतुं मालूम पडे छे तेम क्रोधादिक पण थतां मालूम पडतां नथी. अहाहा...! ज्ञानानंदस्वभावी वस्तु आत्मा ज्यारे ज्ञान अने आनंद स्वभावे निर्मळ परिणमतो भासे छे ते वखते ते रागपणे के क्रोधादिपणे परिणमतो भासतो नथी. परिपूर्ण वीतरागता न थई होय त्यां सुधी ज्ञानीने राग आवे खरो, परंतु तेने (रागने) जाणवापणे हुं परिणमुं छुं, रागपणे नहि एम ते माने छे. आ सांभळीने कोई कहे के आ तो बधी निश्चयनी वातो छे. परंतु भाई! निश्चयनी वात एटले ज साची वात. भाई! वस्तु-स्वरूप ज आवुं छे. ‘जैन तत्त्वमीमांसा’मां पंडित श्री फूलचंदजीए लख्युं छे के पोताना स्वभावनी पुष्टि करवी ए निश्चय छे.
भाई! बहु धीरजथी आ समजवा जेवी वातो छे. प्रथम एम सिद्ध कर्युं के आत्मा स्वभावमात्र वस्तु छे. प्रभु! तुं कोण छो? तो कहे छे के-तुं स्वभावमात्र वस्तु छो, चैतन्यमात्र वस्तु छो; राग अने पुण्य पाप ए तुं नहि. अहाहा...! आवी चैतन्यस्वभावमय वस्तु-आत्माने द्रष्टिमां लेतां जे स्वभावनुं-चैतन्यनुं परिणमन थाय ते धर्म छे अने ते वेळा धर्मी जीवने जेम चैतन्यनुं परिणमन थतुं मालूम पडे छे तेम रागनुं परिणमन थतुं मालूम पडतुं नथी. बहु झीणी वात, भाई! कहे छे के बन्ने क्रिया एक साथे थई शक्ती नथी. अहाहा...! रागथी भिन्न पडीने स्वभावपणे ज्यां ज्ञान परिणम्युं त्यां ज्ञानीने-हुं कर्ता अने जे ज्ञाननी पर्याय थई, आनंदनी पर्याय थई ते मारुं कार्य एम प्रतिभासे छे पण हुं राग करुं छुं अने राग मारुं कार्य एम प्रतिभासतुं नथी. अहो! धर्मना स्थंभ एवा दिगंबर संतोए गजबनी वातो करी छे. धर्मना स्वरूपनी आवी वात बीजे कयांय नथी.