Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा ७१] [ २७

हवे कहे छे-‘अने क्रोधादिकनुं जे थवुं-परिणमवुं ते ज्ञाननुं पण थवुं-परिणमवुं नथी, कारण के क्रोधादिकना थवामां जेम क्रोधादिक थतां मालूम पडे छे तेम ज्ञान पण थतुं मालूम पडतुं नथी.’ जीव क्रोधादि कषायनी रुचिपणे परिणमे ते वखते चैतन्य-स्वभावपणे-ज्ञानपणे पण परिणमे एम होई शक्तुं नथी एम अहीं कहे छे.

जुओ! कर्ताकर्म सिद्ध करवुं छे ने! अहीं बे वात करी छे.

१. जेने चैतन्यस्वभावमय शुद्ध आत्मानी द्रष्टि थई ते जीव (ज्ञानी)ने पोते ज्ञानपणे, आनंदपणे, शांतिपणे परिणमे छे एम भासे छे पण रागपणे, आकुळतापणे, अशांतिपणे परिणमे छे एम मालूम पडतुं नथी.

२. अने स्वभावना भान विना ज्यारे जीव (अज्ञानी) क्रोधादि कषायनी-रागनी रुचिपणे परिणमे त्यारे क्रोधादि कषायरूपे थतो मालूम पडे छे पण ज्ञानपणे-शुद्धपणे परिणमतो मालूम पडतो नथी.

अहीं तो चैतन्यस्वभाव अने कर्म विभाव ए बन्नेने भिन्न पाडया छे. पर्याय उपरनी द्रष्टि छोडीने जेने द्रव्य उपर द्रष्टि गई एने ज्ञान अने आनंदनुं ज कर्म छे. ए ज्ञान अने आनंदनो ज कर्ता छे. खरेखर तो पर्याय पोते कर्ता अने पर्याय पोते ज कर्म छे. ४७ नयना अधिकारमां जे एम कह्युं छे के-राग छे ते मारुं परिणमन छे एम ज्ञानी जाणे छे त्यां, रागमां भळीने एने जाणे छे एम नथी, पण रागथी भिन्न रहीने जाणे छे. अहीं कहे छे के भगवान पूर्णानंदस्वरूप आत्मानुं जेने भान थयुं तेने ज्ञान अने शांतिनुं ज एकलुं वेदन छे. अने व्रत, तप, भक्ति, पूजा इत्यादि शुभरागथी धर्म थाय छे एम जेने रागनी रुचि छे एवो मिथ्याद्रष्टि जीव पोते रागपणे परिणमतो भासे छे, पण ज्ञानपणे परिणमतो भासतो नथी.

प्रश्नः– तो शुं ज्ञानीने रागनुं परिणमन छे ज नहि?

उत्तरः– भाई! एम नथी. पर्यायमां ज्यां सुधी पुरुषार्थनी मंदता छे त्यां सुधी ज्ञानीने (यथासंभव) रागनुं परिणमन छे, पण ते एने जाणे छे. व्यवहारे जाणेलो प्रयोजनवान छे एम (गाथा १२ मां) कह्युं छे ने? एटले के राग जे अशुद्धतानो अंश छे तेने ते जाणे छे- जाणवापणे परिणमे छे (कर्तापणे नहि). भाई! स्वभावनी रुचिना परिणमन वखते विकारनी रुचिनुं परिणमन अने विकारनी रुचिना परिणमन वखते स्वभावनी रुचिनुं परिणमन-एम बे एक समयमां एकसाथे होई शके नहि एम अहीं कहे छे. आवी वात जे त्रिलोकीनाथ सर्वज्ञ परमेश्वरनी दिव्यध्वनिमां आवी ते पोते अनुभव करीने संतोए जगत सामे जाहेर करी छे.

कहे छे-मार्ग तो आ ज छे. रागथी भिन्न पडतां ज्यां भेदज्ञान थयुं, सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान थयुं त्यां हुं शुद्धपणे परिणमुं छुं एम ज्ञानीने भासे छे; अल्प अशुद्ध