Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ परिणमन जे छे ते त्यां (द्रव्यद्रष्टिनी प्रधानतामां) गौण छे. अने भेदज्ञानना अभावमां ज्यां एकलुं अशुद्धतारूप परिणमन भासे छे त्यां मिथ्याद्रष्टिने आत्मा शुद्धपणे भासतो ज नथी. परनी दया हुं पाळुं छुं एवा कर्तापणाना भावना भासनमां हुं शुद्ध चैतन्यघन ज्ञातापणे परिणमुं छुं एम होई शक्तुं ज नथी. ज्ञाता वखते कर्ता नहि अने कर्ता वखते ज्ञाता नहि. अहो! दिगंबर संतोए कोई अलौकिक मार्ग बताव्यो छे!

‘आ रीते आत्माने अने क्रोधादिकने निश्चयथी एक वस्तुपणुं नथी.’ आत्मानो स्वभाव शुद्ध चैतन्य छे. अने क्रोधादि आस्रवो छे ए आत्माथी विरुद्ध स्वभाववाळा छे. तेथी आत्मानो स्वभाव अने क्रोधादिक विभाव ए बन्ने एक वस्तु नथी. क्रोधादि भावो तो आत्माना स्वभावनो अनादर अने अरुचि थतां थयेला छे. तेथी आत्मा अने क्रोधादिक भावो एक नथी.

अहाहा...! आत्मा-वस्तु शुद्ध चिद्घन अतीन्द्रिय आनंदनो पिंड प्रभु छे. एनी जेने अंतर्द्रष्टि थई तेने तो आत्मा ज्ञानपणे, निराकुळ आनंदपणे परिणमेलो भासे छे, परंतु क्रोधादिक विकारना प्रेममां फसाईने जे पर्यायबुद्धिए विकारपणे परिणम्यो तेने शुद्ध चैतन्यनुं ज्ञातापणे परिणमन भासतुं नथी-होतुं नथी. अहाहा...! कोई द्रुर्द्धर तप करे, मौन पाळे के छ कायना जीवनी रक्षा करे, पण जो तेने रागनी-क्रोधादिनी रुचि छे तो तेने चैतन्यनुं शुद्ध ज्ञातापणे परिणमन भासतुं नथी-होतुं नथी. भाई! जेने परलक्षी क्षयोपशमविशेषनी पण अधिकता (गौरव) भासे छे तेने पण विकारनुं ज परिणमन भासे छे. परसत्तावलंबी ज्ञानना प्रेममां तेने चैतन्यस्वभाव प्रत्ये अनादर ज रहेलो छे. तेने चैतन्यस्वरूपी आत्मा अने तेना निर्मळ ज्ञान-परिणमननी खबर ज नथी.

लोकोने आवी निश्चयनी वात आकरी पडे छे, पण शुं थाय? एकांत थई गयुं, एकांत थई गयुं-एम राडो पाडे छे, पण भाई! आ तो सम्यक् एकान्त छे. बापु! वीतराग धर्मनी वात जरा धीरज राखीने सांभळवा जेवी छे, समजवा जेवी छे. धर्म ए कांई बहारनी पंडिताईनो विषय नथी, ए तो अंतरनी चीज छे. अनुभवनी चीज छे.

कह्युं नथी के-वस्तुनो स्वभाव ते धर्म? अहाहा...! वस्तुनो स्वभाव शुद्ध ज्ञान अने आनंद छे. अने ते एनो त्रिकाळी धर्म छे. हवे ते त्रिकाळीने लक्षमां लई निर्मळ ज्ञान अने आनंदपणे परिणमे तेनुं नाम प्रगट धर्म छे. अने त्रिकाळीनो अनादर करीने दया, दान, व्रत, तप आदि पुण्यभावना प्रेममां रोकाई विकारपणे परिणमे छे ते स्वभावथी विरुद्ध अधर्म छे, तेने चैतन्यस्वभावनुं परिणमन होतुं नथी.

अंतरमां चैतन्यमूर्ति आनंदनो नाथ भगवान आत्मा नित्य बिराजमान छे. एनुं अस्तित्व जेने पोतापणे भास्युं नथी तेणे कयांक तो पोतापणे अस्तित्व मान्युं छे ने! तेणे पर्यायमां जे क्रोधादि कषाय छे तेमां पोतानुं अस्तित्व मान्युं छे. एटले ते