Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 801 of 4199

 

समयसार गाथा ७१] [ २९ स्वभावने भूलीने क्रोधादि कषायपणे विभाव-स्वभावे परिणमे छे. एनुं आ परिणमन अधर्म छे.

अत्यारना लोको महा भाग्यशाळी छे के आ काळे आवी वात तेमने सांभळवा मळी छे. प्रभु! आ तो सर्वज्ञ वीतरागनी वाणी छे. सांभळीने अंतरमां निर्णय कर, तुं न्याल थई जईश. हवे अडधा कलाक पछी भक्ति थशे. पण अहीं कहे छे-भगवाननी भक्तिनो जे भाव छे ते राग छे. ए रागपणे हुं छुं एम जे भासे छे ते अधर्म छे, केमके हुं आत्मा ज्ञानस्वरूपी छुं एम एमां भासतुं नथी.

प्रश्नः- समकिती निरास्रव छे, तेने राग होय नहि एम शास्त्रमां आवे छे ने?

उत्तरः– हा, आवे छे. पण कई अपेक्षाए? द्रष्टिनो विषय जे पोतानुं त्रिकाळी शुद्ध स्वरूप छे ए अपेक्षाए ज्ञानीने राग नथी एम कह्युं छे. परंतु ज्ञाननी अपेक्षाए जोवामां आवे तो दशमा गुणस्थाने पण ज्ञानीने सूक्ष्म लोभ-परिणाम छे. ज्ञानधारा अने कर्मधारा- साधकने बन्ने साथे वहे छे. ज्यारे अज्ञानीने एकली कर्मधारा, रागनी रुचिना प्रेमनी मिथ्यात्वधारा ज वहे छे. ज्ञानीने एकली ज्ञानधारा छे, पण साथे जे स्वभावथी विरुद्ध रागधारा छे तेने ते जाणी ले छे. आ जे रागधारा छे तेटलुं दुःख छे, बंधन छे-एम ते जाणे छे. समकिती विषयना रागमां जोडायो होय तोपण ते रागने जाणवापणे परिणमतो, हुं रागथी भिन्न ज्ञानस्वरूपी ज छुं-एम ज्ञानरूपे ज परिणमे छे. ज्ञानी बन्नेने भिन्न-भिन्न पाडी ज्ञानरूपे परिणमे छे.

अहाहा! अंदरमां आनंदनुं धाम भगवान आत्मा छे. एनी एक समयनी ज्ञाननी पर्यायमां आखो ध्रुव भगवान भासे, एनी एक समयनी श्रद्धानी पर्यायमां पूर्णानंदनो नाथ प्रतीतिमां आवे-आनुं नाम धर्म छे. आवा धर्मस्वरूपे ज्ञाननुं थवुं-परिणमवुं ते मोक्षमार्ग छे. परंतु जेमने पोताना ध्रुव चैतन्य स्वभावनुं भान नथी तेओ वर्तमान रागनी रुचिमां रोकाई जईने कृत्रिम रागने अनुभवनारा क्रोधादिनी ज क्रिया करवावाळा छे, ते स्वभावना अभावरूप विभावनी ज क्रिया करवावाळा छे. (तेओ संसारमां रखडनारा छे). आवुं नग्न सत्य जगतनी परवा कर्या विना दिगंबर संतोए जाहेर कर्युं छे. कोई मानो, न मानो; सौ स्वतंत्र छे.

आ रीते आत्मा अने क्रोधादिक निश्चयथी एक वस्तु नथी. भाई! जो बन्ने एक होय तो भेदज्ञान थतां जुदी पडे ज केवी रीते? परंतु आवी सूक्ष्म वात लोकोने बेसे नहि एटले बहारना (व्रत, तप, आदि) व्यवहारमां चढी जाय अने एनाथी लाभ (धर्म) थशे एवुं माने पण एथी तो धूळेय धर्म नहि थाय. (पुण्य पण सारा नहीं बंधाय).