३० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
मुंबईमां प्रश्न थयेलो के-आप आपनी लाकडी माथे फेरवो छो तो लोको पैसादार थई जाय छे-आ वात बराबर छे?
त्यारे कहेलुं के-लाकडी कोई फेरवतुं नथी, लाकडी कोई उपर फरती नथी अने लाकडीने लईने कोईनुं कांई थतुं नथी अहाहा...! आ परम (तत्त्वनी, धर्मनी) सत्यनी वात बहार आवी छे ते सत्समागम करीने महिनो बे महिना ध्यानथी सांभळे त्यां एना शुभभावथी (ऊंचां) पुण्य बंधाई जाय. ए पुण्यना फळरूपे एने बाह्य सामग्री देखाय. भाई! जीवोने जे शुभभाव थाय ते पण एना पोताथी, तथा पुण्य बंधाय अने सामग्री मळे ते पण पोतपोताना कारणे छे. कोई कोईना कारणे नथी तो पछी अमारा कारणे मळे छे के लाकडीने लईने मळे छे ए वात ज कयां रहे छे? ए वात बीलकुल बराबर नथी. सामग्रीनुं आववुं, न आववुं ए पुण्य-पापना उदयने आधीन छे.
हवे कहे छे-‘आ प्रमाणे आत्मा अने आस्रवोनो विशेष (तफावत) देखवाथी ज्यारे आ आत्मा तेमनो भेद जाणे छे त्यारे आ आत्माने अनादि होवा छतां पण अज्ञानथी उत्पन्न थयेली एवी (परमां) कर्ताकर्मनी प्रवृत्ति निवृत्त थाय छे.’
जुओ! कर्ताकर्मनी प्रवृत्ति जीवने अनादिथी छे; छतां ते प्रवाहपणे-संतानपणे अनादिथी छे माटे टळी शके छे. वळी ते अज्ञान वडे उत्पन्न थयेली छे, स्वभावथी नहि. माटे ते चैतन्यस्वभावना ज्ञान वडे टळी शके छे. हुं रागनो कर्ता अने राग मारुं कर्म-एवी अनादि अज्ञानथी उत्पन्न थयेली कर्ताकर्मनी प्रवृत्ति छे. ते भेदज्ञान थतां जीव एनाथी निवृत्त थाय छे. ज्ञानमां क्रोधादि नथी अने क्रोधादिमां ज्ञान नथी एवो बन्नेनो स्वभावभेद अने वस्तुभेद जाणीने ज्यां अंतर्द्रष्टि सहित भेदज्ञान थयुं त्यां अज्ञानथी उत्पन्न थयेली कर्ताकर्मनी प्रवृत्तिथी जीव निवृत्त थाय छे. संवर अधिकारमां कळश आवे छे के-
मतलब के जे कोई सिद्ध थया छे ते भेदविज्ञानथी सिद्ध थया छे, अने जे कोई बंधाया छे ते भेदविज्ञानना अभावथी बंधाया छे. जीवने अज्ञान अनादिनुं छे. ते वडे कर्ताकर्मनी प्रवृत्ति छे. भेदविज्ञान थतां ते कर्ताकर्मप्रवृत्तिथी निवृत्त थाय छे.
‘तेनी निवृत्ति थतां अज्ञानना निमित्ते थतो पौद्गलिक द्रव्यकर्मनो बंध पण निवृत्त थाय छे. एम थतां, ज्ञानमात्रथी ज बंधनो निरोध सिद्ध थाय छे.’ आचार्य कहे छे के क्रोध अने आत्मानुं भेदविज्ञान थाय त्यारे तेमना एकपणारूप अज्ञान मटी जाय छे, अने नवुं कर्म पण बंधातुं नथी. आ प्रमाणे ज्ञानमात्रथी ज बंधनो निरोध