Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 803 of 4199

 

समयसार गाथा ७१] [ ३१ सिद्ध थाय छे. अहीं ज्ञान एटले एकलुं (बहारनुं) जाणपणुं एम नहि, पण रागथी भिन्न पडी स्वभावनी प्रतीति, स्वभावनुं ज्ञान अने एमां ज रमणता एवी जे ज्ञाननी क्रिया तेनाथी ज बंधनो निरोध सिद्ध थाय छे-एटले के नवुं कर्म बंधातुं नथी.

* गाथा ७१ः भावार्थ उपरनुं प्रवचन *

क्रोधादिक अने ज्ञान जुदी जुदी वस्तुओ छे; ज्ञानमां क्रोधादिक नथी, क्रोधादिकमां ज्ञान नथी. जुओ! संवर अधिकारमां आवे छे के स्वभाव अने विभाव बे भिन्न चीज छे. विभावने उत्पन्न थवानो आधार आत्मा नथी. अहाहा...! चिदानंदघन-स्वरूप भगवान आत्मानुं भान थतां एमां क्रोधादिक आवता नथी. तथा क्रोधादिकना परिणाममां ज्ञान नथी. आम ज्ञान अने क्रोधादिक भिन्न छे एवुं भेदज्ञान थाय त्यारे तेमना एकपणानुं अज्ञान मटे छे. अनादिथी जीवने दया, दान, व्रत, तप आदि शुभभाव अने भगवान शुद्ध चैतन्यस्वभाव-ए बन्नेना एकपणारूप अज्ञान छे. भेदविज्ञान थतां तेने ते अज्ञान मटे छे अने अज्ञान मटवाथी नवा कर्मनो बंध थतो नथी. आ रीते ज्ञानथी ज बंधनो निरोध थाय छे.

संप्रदायमां अमारा गुरु श्री हीराचंदजी महाराज हता. ते बहु ज सरळ, भद्रिक सज्जन हता. बाह्य क्रियाओनुं कडक पालन करता. तेमना माटे कोईक वखत विचार आवे के आवी वात तेमने सांभळवा पण न मळी! अरे! आ वात ते वखते हती ज नहि. छ कायना जीवोनी दया पाळवी अने व्रत, तप आदि बहारनी क्रिया करवी ए ज धर्म-आवी वात ते वखते हती. भाई! वीतरागनो मार्ग लोको माने छे. तेनाथी तद्न जुदो छे. रागनी क्रिया ते धर्म नहि, पण अंतरना अनुभवनी क्रिया ते खरो धर्म छे. अहा! आ वात जेने बेठी ते मार्गने पामीने पोतानुं स्वहित साधी लेशे.

[प्रवचन नं. ११८-११९ * दिनांक ७-७-७६ अने ८-७-७६]