Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 72.

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गाथा–७२

कथं ज्ञानमात्रादेव बन्धनिरोध इति चेत्–

णादूण आसवाणं असुचित्तं च विवरीयभावं
च।
दुक्खस्स कारणं ति य तदो णियत्तिं कुणदि जीवो।। ७२।।

ज्ञात्वा आस्रवाणामशुचित्वं च विपरीतभावं च।
दुःखस्य कारणानीति च ततो निवृतिं करोति जीवः।। ७२।।

हवे पूछे छे के ज्ञानमात्रथी ज बंधनो निरोध कई रीते छे? तेनो उत्तर कहे छेः-

अशुचिपणुं, विपरीतता ए आस्रवोनां जाणीने,
वळी जाणीने दुःखकारणो, एथी निवर्तन जीव करे. ७२.

गाथार्थः– [आस्रवाणाम्] आस्रवोनुं [अशुचित्वं च] अशुचिपणुं अने [विपरीतभावं च] विपरीतपणुं [च] तथा [दुःखस्य कारणानि इति] तेओ दुःखना कारण छे एम [ज्ञात्वा] जाणीने [जीवः] जीव [ततः निवृत्ति] तेमनाथी निवृत्ति [करोति] करे छे.

टीकाः– जळमां शेवाळ छे ते मळ छे-मेल छे; ते शेवाळनी माफक आस्रवो मळपणे- मेलपणे अनुभवाता होवाथी अशुचि छे (-अपवित्र छे) अने भगवान आत्मा तो सदाय अतिनिर्मळ चैतन्यमात्रस्वभावपणे ज्ञायक होवाथी अत्यंत शुचि ज छे (-पवित्र ज छे; उज्ज्वळ ज छे). आस्रवोने जडस्वभावपणुं होवाथी तेओ बीजा वडे जणावायोग्य छे (- कारण के जे जड होय ते पोताने तथा परने जाणतुं नथी, तेने बीजो ज जाणे छे-) माटे तेओ चैतन्यथी अन्य स्वभाववाळा छे; अने भगवान आत्मा तो, पोताने सदाय विज्ञानघनस्वभावपणुं होवाथी, पोते ज चेतक (-ज्ञाता) छे (-पोताने अने परने जाणे छे-) माटे चैतन्यथी अनन्य स्वभाववाळो ज छे (अर्थात् चैतन्यथी अन्य स्वभाववाळो नथी). आस्रवो आकुळताना उपजावनारा होवाथी दुःखनां कारणो छे; अने भगवान आत्मा तो, सदाय निराकुळता-स्वभावने लीधे कोईनुं कार्य तेम ज कोईनुं कारण नहि होवाथी, दुःखनुं अकारण ज छे (अर्थात् दुःखनुं कारण नथी). आ प्रमाणे विशेष (-तफावत) देखीने ज्यारे आ आत्मा, आत्मा अने आस्रवोनो भेद जाणे छे ते ज वखते क्रोधादि आस्रवोथी निवृत्त थाय छे, कारण के तेमनाथी जे निवर्ततो न होय तेने आत्मा अने आस्रवोना पारमार्थिक (साचा) भेदज्ञाननी सिद्धि ज थई नथी. माटे क्रोधादिक आस्रवोथी निवृत्ति साथे जे अविनाभावी