Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 805 of 4199

 

समयसार गाथा ७२] [ ३३ छे एवा ज्ञानमात्रथी ज, अज्ञानथी थतो जे पौद्गलिक कर्मनो बंध तेनो निरोध थाय छे.

वळी, जे आ आत्मा अने आस्रवोनुं भेदज्ञान छे ते अज्ञान छे के ज्ञान छे? जो अज्ञान छे तो आत्मा अने आस्रवोना भेदज्ञानथी तेनी कांई विशेषता न थई. अने जो ज्ञान छे तो (ते ज्ञान) आस्रवोमां प्रवर्ते छे के तेमनाथी निवर्त्युं छे? जो आस्रवोमां प्रवर्ते छे तोपण आत्मा अने आस्रवोना अभेदज्ञानथी तेनी कांई विशेषता न थई. अने जो आस्रवोथी निवर्त्युं छे तो ज्ञानथी ज बंधनो निरोध सिद्ध थयो केम न कहेवाय? (सिद्ध थयो ज कहेवाय.) आम सिद्ध थवाथी अज्ञाननो अंश एवा क्रियानयनुं खंडन थयुं. वळी जे आत्मा अने आस्रवोनुं भेदज्ञान छे ते पण जो आस्रवोथी निवृत्त न होय तो ते ज्ञान ज नथी एम सिद्ध थवाथी ज्ञाननो अंश एवा (एकांत) ज्ञाननयनुं पण खंडन थयुं.

भावार्थः– आस्रवो अशुचि छे, जड छे, दुःखनां कारण छे अने आत्मा पवित्र छे, ज्ञाता छे, सुखस्वरूप छे. ए रीते लक्षणभेदथी बन्नेने भिन्न जाणीने आस्रवोथी आत्मा निवृत्त थाय छे अने तेने कर्मनो बंध थतो नथी. आत्मा अने आस्रवोनो भेद जाण्या छतां जो आत्मा आस्रवोथी निवृत्त न थाय तो ते ज्ञान ज नथी, अज्ञान ज छे. अहीं कोई प्रश्न करे के अविरत सम्यग्द्रष्टिने मिथ्यात्व अने अनंतानुबंधी प्रकृतिओनो तो आस्रव नथी थतो पण अन्य प्रकृतिओनो तो आस्रव थईने बंध थाय छे; तेने ज्ञानी कहेवो के अज्ञानी? तेनुं समाधानः- सम्यग्द्रष्टि जीव ज्ञानी ज छे कारण के ते अभिप्रायपूर्वकना आस्रवोथी निवर्त्यो छे. तेने प्रकृतिओनो जे आस्रव तथा बंध थाय छे ते अभिप्रायपूर्वक नथी. सम्यग्द्रष्टि थया पछी परद्रव्यना स्वामित्वनो अभाव छे; माटे, ज्यां सुधी तेने चारित्रमोहनो उदय छे त्यां सुधी तेना उदय अनुसार जे आस्रव-बंध थाय छे तेनुं स्वामीपणुं तेने नथी. अभिप्रायमां तो ते आस्रव-बंधथी सर्वथा निवृत्त थवा ज इच्छे छे. तेथी ते ज्ञानी ज छे.

ज्ञानीने बंध थतो नथी एम कह्युं छे तेनुं कारण आ प्रमाणे छेः- मिथ्यात्वसंबंधी बंध के जे अनंत संसारनुं कारण छे ते ज अहीं प्रधानपणे विवक्षित (-कहेवा धारेलो) छे. अविरति आदिथी बंध थाय छे ते अल्प स्थिति-अनुभागवाळो छे, दीर्घ संसारनुं कारण नथी; तेथी ते प्रधान गणवामां आव्यो नथी. अथवा तो आ प्रमाणे कारण छेः- ज्ञान बंधनुं कारण नथी. ज्यां सुधी ज्ञानमां मिथ्यात्वनो उदय हतो त्यां सुधी ते अज्ञान कहेवातुं हतुं अने मिथ्यात्व गया पछी अज्ञान नथी, ज्ञान ज छे. तेमां जे कांई चारित्रमोह संबंधी विकार छे तेनो स्वामी ज्ञानी नथी तेथी ज्ञानीने बंध नथी;