३४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
निदमुदितमखण्डं ज्ञानमुच्चण्डमुच्चैः।
ननु कथमवकाशः कर्तृकर्मप्रवृत्ते–
रिह भवति कथं वा पौद्गलः कर्मबन्धः।। ४७।।
कारण के विकार के जे बंधरूप छे अने बंधनुं कारण छे, ते तो बंधनी पंक्तिमां छे, ज्ञाननी पंक्तिमां नथी. आ अर्थना समर्थनरूप कथन आगळ जतां गाथाओमां आवशे.
अहीं कळशरूप काव्य कहे छेः-
श्लोकार्थः– [परपरिणतिम् उज्झत्] परपरिणतिने छोडतुं, [भेदवादान् खण्डयत्] भेदनां कथनोने तोडी पाडतुं, [इदम् अखण्डम् उच्चण्डम् ज्ञानम्] आ अखंड अने अत्यंत प्रचंड ज्ञान [उच्चैः उदितम्] प्रत्यक्ष उदय पाम्युं छे, [ननु] अहो! [इह] आवा ज्ञानमां [कर्तृकर्मप्रवृतेः] (परद्रव्यनां) कर्ताकर्मनी प्रवृत्तिनो [कथम् अवकाशः] अवकाश केम होई शके? [वा] तथा [पौद्गलः कर्मबन्धः] पौद्गलिक कर्मबंध पण [कथं भवति] केम होई शके? (न ज होई शके.)
(ज्ञेयोना निमित्तथी तथा क्षयोपशमना विशेषथी ज्ञानमां जे अनेक खंडरूप आकारो प्रतिभासमां आवता हता तेमनाथी रहित ज्ञानमात्र आकार हवे अनुभवमां आव्यो तेथी ‘अखंड’ एवुं विशेषण ज्ञानने आप्युं छे. मतिज्ञान आदि जे अनेक भेदो कहेवाता हता तेमने दूर करतुं उदय पाम्युं छे तेथी ‘भेदनां कथनोने तोडी पाडतुं’ एम कह्युं छे. परना निमित्ते रागादिरूप परिणमतुं हतुं ते परिणतिने छोडतुं उदय पाम्युं छे तेथी ‘परपरिणतिने छोडतुं’ एम कह्युं छे. परना निमित्तथी रागादिरूप परिणमतुं नथी, बळवान छे तेथी ‘अत्यंत प्रचंड’ कह्युं छे.)
भावार्थः– कर्मबंध तो अज्ञानथी थयेली कर्ताकर्मनी प्रवृत्तिथी हतो. हवे ज्यारे भेदभावने अने परपरिणतिने दूर करी एकाकार ज्ञान प्रगट थयुं त्यारे भेदरूप कारकनी प्रवृत्ति मटी; तो पछी हवे बंध शा माटे होय? अर्थात् न होय. ४७.
हवे पूछे छे के ज्ञानमात्रथी ज बंधनो निरोध कई रीते छे? रागथी भिन्न पडतां जेने आत्मानुं ज्ञान थयुं तेने बंध अटकी जाय छे ए केवी रीते छे? अहाहा! शिष्य जिज्ञासाथी पूछे छे के जेने आत्मानुं ज्ञान थयुं, श्रद्धान थयुं, एनी स्थिरता-