समयसार गाथा ७२] [ ३प रमणता थई, आनंद आव्यो अर्थात् अनंत गुण जे शक्तिरूपे विद्यमान छे ते पर्यायमां अंशे व्यक्त-प्रगट थया तेने बंधनो निरोध थाय छे ते केवी रीते छे? एना उत्तररूपे गाथा कहे छेः-
अनुभवाता होवाथी अशुचि छे (अपवित्र छे)’ जुओ! ‘आस्रवो’-एम बहुवचन छे. एटले पाप अने पुण्यना बन्ने भावो मळपणे-मलिनपणे अनुभवाय छे माटे अशुचि छे. आ रीते दया, दान, व्रत, भक्ति आदि शुभभाव आस्रव छे अने माटे ते अशुचि छे, मेल छे. हाडकां, चामडां अने मांसनुं माळखुं एवुं जे शरीर ते अशुचि छे ए वात तो बाजुए रही, तथा पापभाव अशुचि छे ए पण सौ कहे छे; अहीं तो कहे छे के दया, दान, व्रत, आदि जे पुण्यना भाव थाय छे ते अशुचि छे, अपवित्र छे. अहाहा...! जे भावे तीर्थंकर नामकर्म बंधाय ते भाव मलिन छे एम अहीं कहे छे. शुभभावमां धर्म माननारा अज्ञानीओने आकरी लागे एवी वात छे, पण स्वरूपनो आस्वादी ज्ञानी पुरुष तो शुभभावो-पुण्यभावोने मलिन जाणे छे, अने तेथी हेय माने छे. रागनी गमे तेवी मंदताना शुभ परिणाम होय पण ते मेला छे, अशुचि छे, झेररूप छे. शास्त्रमां कोई जगाए तेने अमृतरूप कह्या होय पण ते वास्तविकपणे झेर ज छे. अमृतनो सागर भगवान आत्मा छे. एनो स्वाद जेने अंतरमां आव्यो, धर्मी जीवने जे रागनी मंदताना परिणाम होय तेने आरोप करीने व्यवहारथी अमृत कह्या छे, तोपण निश्चयथी ते झेर छे; अशुचि छे; अपवित्र छे. ‘अने भगवान आत्मा तो सदाय अतिनिर्मळ चैतन्यमात्र-स्वभावपणे ज्ञायक होवाथी अत्यंत शुचि ज छे (-पवित्र ज छे; उज्ज्वळ ज छे).’ आचार्यदेवे आत्माने ‘भगवान आत्मा’-एम कहीने संबोधन कर्युं छे.
उत्तरः– हा, ते हमणां पण भगवान छे अने त्रणे काळे भगवान छे. जो भगवान (शक्तिए) न होय तो भगवानपणुं प्रगटशे कयांथी? ‘सदाय’ एम कह्युं छे ने?
अहाहा...! आचार्यदेव एने ‘भगवान आत्मा’-एम कहीने मोहनी निद्रामांथी जगाडे छे. जेम माता पोताना बाळकने घोडियामां सुवाडीने तेनां वखाण करीने उंघाडे छे. ‘दीकरो मारो डाह्यो अने पाटले बेसी नाह्यो, भाई, हाला!’-एम मीठां हालरडां गाईने माता बाळकने उंघाडी दे छे; तेम अहीं संतो एने ‘भगवान आत्मा’ कहीने