३६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ जगाडे छे. जाग रे जाग भगवान! जागवानां हवे टाणां आव्यां त्यारे निंदर पालवे नहि. आम मीठां हालरडां गाईने जिनवाणी माता एने मोहनिद्रामांथी जगाडे छे.
पुण्य अने पापना भाव तो मलिन छे अने भगवान आत्मा तो सदाय अतिनिर्मळ छे. सदाय एटले त्रणेय काळ आत्मा अतिनिर्मळ छे. एकेन्द्रिय-निगोदमां हो के पंचेन्द्रियमां हो, वस्तु जे द्रव्य छे ए तो त्रिकाळ निर्मळानंद चैतन्यमय प्रभु ज छे. अहीं निर्मळ न कहेतां अतिनिर्मळ कह्यो छे. एटले आत्मा-द्रव्य निर्मळ, तेना गुण निर्मळ अने तेनी कारणपर्याय पण निर्मळ-एम त्रणे काळे आत्मा अतिनिर्मळ छे. अहाहा...! पवित्रताना स्वभावथी भरेलो, निर्मळानंदनो नाथ, चैतन्यमूर्ति भगवान आत्मा सदाय अतिनिर्मळ छे, पवित्र छे. जाणग-जाणग-जाणग-एम जाणगस्वभावपणे ज्ञायक होवाथी ते अत्यंत पवित्र ज छे, उज्ज्वळ ज छे. तेनुं स्वरूप ज आवुं छे.
आस्रवो कहेतां पुण्य-पाप बंने एमां आवी जाय छे. सात तत्त्वमां जे आस्रव तत्त्व कह्युं छे तेमां पुण्य-पाप गर्भित छे. नव तत्त्व कह्यां छे त्यां पुण्य-पापने जुदां पाडीने नव कह्यां छे. ज्ञानीने शुभाशुभ बन्ने भाव आवे छे, परंतु तेने एनुं ज्ञानमां भिन्नपणे ज्ञान वर्ते छे. अहाहा! अतिनिर्मळ निज चैतन्यस्वभावनो अनुभव करनार ज्ञानी शुभाशुभ- भावोने, पुण्य-पापना भावोने मेलपणे जाणे छे. पुण्यना भावने पण ते छोडवा योग्य, हेय जाणे छे, माने छे.
जुओ! श्रेणिक राजा क्षायिक समकिती हता. तेमने हजारो राणीओ हती. हजारो राजाओ तेमनी सेवा करता. अपार वैभव हतो. पुरुषार्थनी नबळाईने कारणे विषयोनी प्रवृत्ति पण हती. छतां ते वखते आत्मा आस्रवोथी भिन्न छे एवुं तेमने भेदज्ञान वर्ततुं हतुं. चारित्रनो दोष हतो ते ज वखते हुं एनाथी (दोषथी) भिन्न छुं एवुं भान हतुं. अहाहा...! रागथी भिन्न हुं तो विज्ञानघनस्वरूप अतिनिर्मळ छुं एवुं जे भान थयुं हतुं ते क्षणमात्र पण तेमने खसतुं नहोतुं. धर्मी जीवने आवी जे अंतरंगमां भेदज्ञाननी क्रिया वर्ते छे तेनाथी बंधनो सहज निरोध थाय छे. ल्यो, आ एक बोल थयो.
हवे बीजो बोल कहे छे-‘आस्रवोने जडस्वभावपणुं होवाथी तेओ बीजा वडे जणावा योग्य छे माटे तेओ चैतन्यथी अन्यस्वभाववाळा छे.’ शुभराग हो के अशुभराग हो; ते बन्ने अचेतन छे. ते नथी जाणता पोताने के नथी जाणता परने. तेओ बीजा वडे जणावा योग्य छे. गजब वात छे! जे भावे तीर्थंकर गोत्र बंधाय के जे भावे इन्द्रादि पद मळे ते भाव जड, अचेतन छे; अन्यथा एनाथी बंध केम थाय? पुण्य-पापना भावमां चैतन्यना प्रकाशनुं नूर नथी, एमां ज्ञाननुं किरण नथी. पुण्य-पापना भाव तो अंधकार छे. दया, दान, भक्ति आदि परिणाम अंधकार छे, चैतन्यथी शून्य छे, तेओ स्व-परने जाणता नथी पण तेओ चैतन्यद्वारा जणाय छे. माटे तेओ चैतन्यथी अन्यस्वभाववाळा छे.