समयसार गाथा ७२] [ ३७
शत्रुंजयना पहाड उपर पांच पांडव मुनिराजो ध्यानमां लीन हता. तेमने दुर्योधनना भाणेज द्वारा ज्यारे परिषह आवी पडयो त्यारे धर्मराजा युधिष्ठिर, अर्जुन अने भीम ए त्रणे विकल्प तोडीने स्वरूपमां ठरी गया अने मोक्ष साधी लीधो; परंतु सहदेव अने नकुळ मुनिराजोने जरीक विकल्प उठयो के-अरे! मुनिवरोने आवो उपसर्ग! लोढानां धगधगतां घरेणां पहेराव्यां! अरे, ए मुनिवरोने केम हशे? आ विकल्पना फळमां ए बे मुनिवरोने ३३ सागरोपमनुं सर्वार्थसिद्धिनुं आयुष्य बंधाई गयुं. एटलुं केवळज्ञान दूर गयुं. जुओ आ विकल्पनुं फळ! त्यांथी नीकळीने मनुष्य थई उग्र साधन करीने मोक्षपद पामशे. अहीं कहे छे के आवो साधर्मी मुनिओ प्रत्येनो शुभ विकल्प जे ऊठयो ते जड, अचेतन छे. संयोगीभाव छे ने? एनाथी संयोग ज प्राप्त थयो (आत्मोपलब्धि न थई). एनाथी-शुभ विकल्पथी पुण्यनां जड रजकणो बंधाया माटे ते जड, अचेतन छे, चैतन्यथी अन्यस्वभाववाळा छे.
‘अने भगवान आत्मा तो, पोताने सदाय विज्ञानघनस्वभावपणुं होवाथी, पोते ज चेतक (ज्ञाता) छे माटे चैतन्यथी अनन्य स्वभाववाळो ज छे.’
आत्मा सदाय विज्ञानघनस्वभावी छे. विज्ञानघन एटले ज्ञाननो घनपिंड छे, निबीड, नकोर छे. त्रणेकाळ एवो नकोर छे के एमां परनो के रागनो प्रवेश थई शक्तो नथी. विज्ञानघनस्वभावपणे होवाथी पोते ज चेतक-ज्ञाता छे, पोताने अने परने जाणे छे. पोतानो विज्ञानघनस्वभाव होवाथी पोताने जाणे छे अने जे राग थाय तेने पण जाणे छे. अहाहा! पर पदार्थना अनंत भावोने जाणवा छतां परनो अंश पण प्रवेशी न शके एवो ते विज्ञानघनरूप निबीड छे.
आवो विज्ञानघनस्वरूप आत्मा पोते ज चेतक छे तेथी शुद्ध चैतन्यथी अनन्य-एकरूप स्वभाववाळो छे; ज्यारे रागादि विकार पोते पोताने अने परने नहि जाणता एवा जड, अचेतन होवाथी चैतन्यथी अन्य स्वभाववाळो छे. आ प्रमाणे भेदज्ञान करीने शुद्ध चैतन्यना लक्षे परिणमतां जे ज्ञान थाय छे एनाथी कर्मबंधन अटके छे. आम ज्ञानमात्रभावे परिणमवुं ए ज बंधन अटकाववानो एकमात्र उपाय छे.
प्रश्नः– आमां पच्चकखाण तो आव्युं नहि? तो पछी बंधन केम अटके?
उत्तरः– अरे भाई! तने पच्चकखाणना स्वरूपनी खबर नथी. ज्ञान अने रागनुं भेदज्ञान थतां शुद्ध चैतन्यना लक्षे जे स्वरूपनां श्रद्धान अने ज्ञान प्रगट थयां अने जे अंशे स्वरूपमां स्थिरता थई ए ज वास्तविक पच्चकखाण छे. सम्यक्त्व थतां मिथ्यात्व संबंधीनो अने अनंतानुबंधीनो बंध तो एने थतो ज नथी. अने जे अल्प बंध थाय छे ते गौण छे. भेदज्ञानना बळे स्वरूपस्थिरता वधारतां तेनो पण अल्प काळमां नाश थई जाय छे. अज्ञानी बाह्य त्यागसंबंधी शुभभावने पच्चकखाण माने छे. परंतु