३८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ भाई! शुभभाव तो चैतन्यथी अन्य स्वभाववाळो छे, अचेतन छे, बंधरूप छे. एनाथी बंधन केम अटके? (न अटके). माटे शुद्ध चैतन्यना लक्षे थतुं ज्ञानमात्र परिणमन ए ज बंधन अटकाववानो-मुक्तिनो उपाय छे.
धर्मीने तो निरंतर भेदज्ञाननो विचार रहे छे के-हुं सदाय विज्ञानघनस्वभावमय छुं, आ शुभभावरूप विभावो छे ते मारुं स्वरूप नथी, केमके तेओ जडना निमित्ते उत्पन्न थयेला छे अने स्वपरने जाणवा समर्थ नथी माटे जड, अचेतन छे, चैतन्यथी अन्यस्वभाववाळा छे. आवा भेदज्ञानना बळे ते अंतरमां स्वरूपस्थिरता वधारीने अंतिम लक्ष्य जे केवळज्ञान तेने प्राप्त करी ले छे. अहो! भेदज्ञाननो कोई अपूर्व महिमा छे! भेदज्ञानना अभावे अज्ञानी अनंतो संसार वधारे छे. बे बोल थया.
हवे त्रीजो बोल कहे छे-‘आस्रवो आकुळताना उपजावनारा होवाथी दुःखनां कारणो छे.’ पुण्य-पापना भाव बन्ने आकुळता उपजावनारा छे. आ दया, दान आदि शुभभाव जे थाय ते आकुळता उपजावनारा छे. आकरी वात, भाई. पण ते एम ज छे. जे भावथी तीर्थंकरनामकर्म बंधाय ते भाव आकुळता उपजावनारो होवाथी दुःखनुं कारण छे एम अहीं कहे छे. भावपाहुडमां शुभभावनी-व्यवहारनी घणी वातो आवे छे. आवी भावना भावतां तीर्थंकरगोत्र बंधाय इत्यादि घणा बोल छे. पचीस प्रकारनी भावना अने बार प्रकारनी भावना-एम घणा प्रकारे त्यां वात करेली छे. ए तो स्वभावनी द्रष्टि होवा छतां पूर्ण वीतराग न थाय त्यां सुधी भूमिका अनुसार धर्मी जीवने शुभभाव केवा प्रकारनो आवे छे एनुं त्यां ज्ञान कराव्युं छे. अशुभभाव आवे तो शुभभाव केम न आवे? अनेक प्रकारना शुभभाव ज्ञानीने आवे छे, पण ते आकुळता उपजावनारा छे एम अहीं कहे छे.
अतिचार रहित निर्दोष व्रत पाळवां, दया, दान, भक्ति इत्यादि करवां-एम व्यवहारनां कथन शास्त्रोमां अनेक प्रकारे आवे, पण ए तो भूमिका प्रमाणे धर्मीने जे शुभराग आवे छे-आव्या विना रहेता नथी एनी ए वात छे. अहीं कहे छे के जेटला शुभ- अशुभ भावना प्रकारो छे ते बधा दुःखनां कारणो छे केमके ते आकुळता उपजावनारा छे. आत्मानी शांतिने रोकनारा छे.
पद्मनंदी मुनिराज वनवासी मुनि हता. तेओ दान अधिकारमां कहे छे के-तारी शान्ति दाझीने आ शुभभाव थया छे. तेने लईने जे पुण्यरूपी उकडिया बंधाया तेना फळमां आ पांच-पचास लाखनी धूळ (संपत्ति)नो संयोग तने देखाय छे. तेनो जो सारा धार्मिक कार्योमां उपयोग न कर्यो तो तुं कागडामांथी पण जईश. केमके कागडो पण एने मळेला दाझेली खीचडीना उकडिया एकलो खातो नथी, पण का, का, का-एम पोकारी पांच-पचीस कागडाओने भेगा करीने खाय छे. आवां कथन शास्त्रमां आवे छे. त्यां लोभ आदि अशुभभाव घटाडीने शुभभाव करवा पूरती वात छे. पण ए छे तो दुःखरूप ज.