समयसार गाथा ७२ ] [ ३९
वास्तवमां तो अशुभथी बचवा धर्मी जीवने एवा शुभभाव यथासंभव आवे छे एनुं त्यां ज्ञान कराव्युं छे. जेने शुद्ध निश्चयनुं भान वर्ते छे, पण स्वरूपमां ठरी शक्तो नथी एने अशुभथी बचवा एवा शुभभाव आवे छे, बल्के आव्या विना रहेता नथी. परंतु ए शुभभाव आत्मानी शान्तिने दझाडनारा छे, दुःखनां कारण छे एम अहीं आचार्यदेव कहे छे.
भगवान कुंदकुंदाचार्यदेव समयसारनी पहेली गाथामां कहे छे के हे श्रोताओ! हुं तमने समयसार कहीश. पांचमी गाथामां कहे छे के एकत्व-विभक्त आत्माने बताववानो में व्यवसाय कर्यो छे, तेने तुं (सांभळीने) अनुभवथी प्रमाण करजे, ज्यारे परमात्मप्रकाशमां आवे छे के-दिव्यध्वनिथी ज्ञान न थाय. जुओ! आ (सत्य) सिद्धांत छे. छतां सांभळवा आवे त्यारे ज्ञानीओ श्रोताने-शिष्यने एम कहे के-सांभळ, हुं तने धर्मकथा संभळावुं छुं. धवलमां पण आवे छे के-‘सूण’ आ शब्दनो त्यां विस्तारथी अर्थ कर्यो छे. जुओ! एक बाजु एम (सिद्धांत) कहे के भगवाननी वाणीथी लाभ न थाय अने बीजी बाजु एम कहे के अमे कहीए छीए ते सांभळ! वळी केटलाक एम कहे छे के-कथनी कांईक अने करणी कांईक. एटले के कार्य उपादानथी थाय एम कथनी करे अने निमित्त वडे उपादानमां लाभ थाय एवी करणी करे, एम के लाखोनुं मंदिर बंधावे, घणा माणसोने भेगा करी उपदेश आपे अने कहे के कार्य उपादानथी थाय, निमित्तथी न थाय. आ केवी वात!
अरे प्रभु! तारी समजणमां फेर छे. उपादान अने निमित्त बंने स्वतंत्र स्वयं पोतपोतानुं काम करे छे, कोई कोईने आधीन नथी. आ तो सिद्धांत छे. अने धर्मीने यथाक्रम उपदेशनो राग आवे अने शिष्यने ते सांभळवानो विकल्प होय-आवो भूमिकानुसार यथासंभव शुभराग-व्यवहार आवतो होय छे, पण एकथी बीजानुं कार्य थाय छे एम नथी. अहीं कहे छे के आ जे भगवाननी वाणी कहेवानो के सांभळवानो विकल्प छे ते आकुळता उपजावनारो छे. बापु! आ कांई खेंचताणनो मार्ग नथी, आ तो सत्यने समजवानो मार्ग छे. ज्यां जे अपेक्षा होय ते अपेक्षा बराबर समजी अर्थ ग्रहण करवो जोईए.
आस्रवो आकुळता उपजावनारा होवाथी दुःखनां कारणो छे; ‘अने भगवान आत्मा तो, सदाय निराकुळ-स्वभावने लीधे कोईनुं कार्य तेम ज कोईनुं कारण नहि होवाथी, दुःखनुं अकारण ज छे.’
जुओ! शुभभावथी स्वर्ग मळे अने अशुभभावथी नरकादि मळे. पण बंने भाव