Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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प६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ पण ते काळे जाणतुं ज्ञान पोताना स्वपरप्रकाशक सामर्थ्य वडे प्रगट थाय छे. वळी ते बळवान छे एटले ज्ञाननी ज्यां उग्रता थई त्यां राग-द्वेष भस्म थई जाय छे. ज्ञाननी उग्रता कर्मना आकरा विपाकना रसने पण भस्म करी दे छे तेथी तेने ‘अत्यंत प्रचंड’ कह्युं छे.

आवो भगवाननो मार्ग बहु सूक्ष्म छे, भाई! शुभरागना स्थूळ विकल्पथी पकडाय एवुं वस्तुतत्त्व नथी. द्रव्यनुं-आत्मानुं स्वरूप तो सूक्ष्म निर्विकल्प छे, अने निर्विकल्प द्रष्टिथी ज पकडाय एम छे.

प्रश्नः– ज्ञाननुं स्वरूप तो सविकल्प कह्युं छे ने?

उत्तरः– त्यां सविकल्प एटले ज्ञान स्व अने परने जाणे छे भेदपूर्वक स्व अने परने जाणवुं एम अर्थ छे. विकल्प एटले राग एम त्यां अर्थ नथी. ज्ञान तो रागथी भिन्न ज छे. निर्विकल्प ज्ञान एटले रागना अवलंबरहित ज्ञानथी ज वस्तुतत्त्व पकडाय एम छे. आ मार्ग छे.

* कळश ४७ः भावार्थ उपरनुं प्रवचन *

कर्मबंध तो अज्ञानथी थयेली कर्ताकर्मनी प्रवृत्तिथी हतो. हवे ज्यारे भेद-भावने अने परपरिणतिने दूर करी एकाकार ज्ञान प्रगट थयुं त्यारे भेदरूप कारकनी प्रवृत्ति मटी; तो पछी हवे बंध शा माटे होय? अर्थात् न होय. ज्ञायकना लक्षे अखंड ज्ञायकनी परिणति जागी त्यारे भेदरूप कारकोनी प्रवृत्ति मटी गई. रागनो हुं कर्ता अने राग मारुं कर्तव्य-ए प्रवृत्ति मटी गई. अभेद कारकनी प्रवृत्ति थई. ज्ञान ज्ञायकने अनुभवतुं प्रगट थयुं. तो पछी भिन्न कारकोनी प्रवृत्तिना अभावमां बंध शा माटे होय? न ज होय. ल्यो, अहीं (गाथा) ७२ पूरी थई.

[प्रवचन नं. १२० थी १२३ * दिनांक ९-७-७६ थी १२-७-७६]