समयसार गाथा ७२ ] [ पप
कोई एम कथन करे छे के-“परद्रव्यनो कर्ता न माने ते दिगंबर नथी, -” आ कथननुं अहीं स्पष्ट निराकरण छे के आत्मद्रव्यमां परद्रव्यनी कर्ताकर्मप्रवृत्तिनो अवकाश होई शके नहि.
अरेरे! जीवो दुःखथी भय पामी सुख शोधे छे, पण एनो उपाय तेओ जाणता नथी! जेम फूलनी कळी शक्तिरूपे छे तेमांथी फूल खीले छे तेम भगवान आत्मा अनंतगुणपांखडीए एक ज्ञायकभाव पणे अंदर बिराजमान छे. द्रष्टि एनो स्वीकार करीने ज्यां अंर्तमग्न थाय छे त्यां पर्यायमां ज्ञायकभाव प्रगट थाय छे. आ ज धर्मनी रीत छे, भाई!
“ज्ञेयोना निमित्तथी तथा क्षयोपशमना विशेषथी ज्ञानमां जे अनेक खंडरूप आकारो प्रतिभासता हता तेमनाथी रहित ज्ञानमात्र आकार हवे अनुभवमां आव्यो तेथी ‘अखंड’ एवुं विशेषण ज्ञानने आप्युं छे.”
३१ गाथामां आव्युं छे के-जेओ विषयोने खंडखंड ग्रहण करे छे एवी भावेन्द्रियो ज्ञानने खंडखंडरूप जणावे छे. खंडखंडने जाणे छे ए बीजी वात, पण ज्ञानने खंडखंडरूप जणावे छे एम त्यां कह्युं छे. ज्ञानवस्तु तो त्रिकाळ अखंड छे. पण ज्ञेयोना निमित्ते ज्ञानमां अनेक खंडरूप आकारो प्रतिभासे छे. परंतु ज्यां ज्ञायकमां अंतर्मग्न थयो त्यां जाणनार- जाणनार-जाणनार एवो अखंड एक ज्ञायकभाव अनुभवमां आवे छे अने तेथी ज्ञाननुं ‘अखंड’ एवुं विशेषण आप्युं छे. आ ‘अखंड’ नी व्याख्या करी.
“मतिज्ञान आदि जे अनेक भेदो कहेवाता हता तेमने दूर करतुं उदय पाम्युं छे तेथी ‘भेदना कथनोने तोडी पाडतुं’ एम कह्युं छे.” कळशटीकामां उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य, द्रव्य-गुण-पर्याय अथवा ‘आत्माने ज्ञानगुण वडे अनुभवे छे’-एवा जे विकल्पो छे ते भेदो छे एम कह्युं छे. ते भेदोने दूर करतुं-मूळथी उखाडतुं ज्ञान प्रगट थाय छे. अहाहा! ‘ज्ञान ते आत्मा’-ए विकल्प छे, भेद छे, अनुपचार व्यवहारनयनो विषय छे. अने वस्तु अखंड एकरूप अभेद ज्ञायक छे. आवा अखंड ज्ञायकनो ज्ञानमां स्वीकार थवो ते सम्यग्दर्शन-ज्ञान छे. एनुं नाम धर्म छे, समजाणुं कांई?
“परना निमित्ते रागादिरूप परिणमतुं हतुं ते परिणतिने छोडतुं उदय पाम्युं छे तेथी ‘परपरिणतिने छोडतुं’-एम कह्युं छे.” अनादिथी राग अने ज्ञानना एकत्वपणे परिणमतो हतो. ते ज्ञान प्रगट थतां बन्नेनी एक्ताबुद्धि छूटी गई अने ज्ञान, ज्ञान भणी वळ्युं तेथी ‘परपरिणतिने छोडतुं’ एम कह्युं छे.
“परना निमित्तथी रागादिरूप परिणमतुं नथी, बळवान छे तेथी ‘अत्यंत प्रचंड’ कह्युं छे.” ज्ञान, रागथी एकपणे थई परिणमतुं नथी पण जे राग थाय तेने पोताथी भिन्न जाणवापणे परिणमे छे. जे काळे राग आव्यो तेने ते काळे जाणतुं अने स्वने