प४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४
लोकोने सत्य तत्त्वनी खबर नथी. भाई! उपरटपके मानी लईए एवी आ वस्तु नथी. आ तो भावमां एनुं भासन थवुं जोईए. त्रणकाळ, त्रणलोक अनादि-अनंत ज्ञेयपणे छे तो तेनो जाणनार कोई काळे न होय एम बनी शके नहि.
भगवान सर्वज्ञदेव जेम त्रिकाळ शाश्वत छे तेम एमनुं मूर्तिरूपे प्रतिबिंब पण जगतमां त्रणे काळ शाश्वत छे. आवी ज वस्तुनी स्थिति छे. अहीं कहे छे के ज्ञायकभावनुं भान थतां अंदर शक्तिरूप जे सामर्थ्य हतुं ते प्रगट थयुं. ए ज्ञानमां रागनो हुं कर्ता अने राग मारुं कर्म-एवी कर्ताकर्मनी प्रवृत्तिनो अवकाश केम होई शके? न ज होई शके.
अरे भाई! प्रगटेलुं ज्ञान जाणवानुं काम करे के कर्ताकर्मनी प्रवृत्तिनुं काम करे? परद्रव्यना कर्ताकर्मनो ज्ञानमां अवकाश ज नथी. परपरिणतिने तो छोडतुं ए प्रगट थाय छे. तो ज्ञानमां एनां कर्ताकर्म केवां? (छे ज नहि).
हवे कहे छे-‘वा’ तथा ‘पौद्गलः कर्मबन्धः’ पौद्गलिक कर्मबंध पण ‘कथम् भवति’ केम होई शके? न ज होई शके. जो ज्ञानमां कर्ताकर्मनी प्रवृत्तिने अवकाश नथी तो कर्मबंधनो अवकाश केम होई शके? न ज होई शके.
कळशटीकाना र९ मां कळशमां आवे छे के-‘सुख, दुःख आदि विभावपर्यायरूप परिणमता जीवना जे काळे आवा अशुद्ध परिणमनरूप संस्कार छूटी जाय छे ते ज काळे तेने अनुभव छे. तेनुं विवरण-शुद्ध चेतनामात्रनो आस्वाद आव्या विना अशुद्ध भावरूप परिणाम छूटता नथी अने अशुद्ध संस्कार छुटया विना शुद्ध स्वरूपनो अनुभव थतो नथी. तेथी जे कांई छे ते एक ज काळ, एक ज वस्तु, एक ज ज्ञान, एक ज स्वाद छे.’ आवो मोक्षनो मार्ग कोई अपूर्व चीज छे, भाई! संसारनो व्यय थईने मोक्ष थाय एनो आ ज उपाय छे. व्यवहारथी आम थाय अने तेम थाय एम लोको वादविवादमां पडया छे परंतु आमां वादविवादने अवकाश नथी.
नियमसारमां प्रायश्चित अधिकारमां आवे छे के-निर्मळ दशा जे वीतराग परिणति प्रगटी ते प्रायश्चित छे. प्रायः+चित, अर्थात् प्रकृष्टपणे चित कहेतां ज्ञान ते प्रायश्चित. एटले त्रिकाळी ज्ञानस्वरूप जे वस्तु छे ते प्रायश्चितस्वरूप ज छे. परिणति प्रगटी ते कार्यनियम छे अने वस्तु जे त्रिकाळी शुद्ध ज्ञानचेतनारूप छे ते कारणनियम छे. एटले के जे कांई निर्मळ परिणति थाय ते प्रकारे आखीय वस्तु स्वभावथी छे. पर्यायमां वीतरागता प्रगट थाय छे तो वस्तु वीतरागस्वरूप ज छे. केवळज्ञान प्रगट थाय तो द्रव्य अखंड ज्ञानस्वरूप ज छे, आवा ज्ञाता-द्रष्टा स्वभावमां जेम रागना कर्ताकर्मनी प्रवृत्तिने अवकाश नथी तेम ध्रुव स्वभावना आश्रये प्रगट थयेली ज्ञान परिणतिमां पण रागना कर्ताकर्मनी प्रवृत्तिने अवकाश नथी. तो पछी कर्ताकर्मनी प्रवृत्तिना अभावमां कर्मनुं बंधन थाय एनो अवकाश कयां रह्यो? (न ज रह्यो).