Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा ७२ ] [ प३ हता, जे खंडरूप ज्ञानाकारो प्रतिभासता हता ते हवे ज्ञायकमां द्रष्टि स्थिर थतां ज्ञान अखंडपणे प्रत्यक्ष उदय पाम्युं छे, अर्थात् एक ज्ञानमात्र वस्तु ज ज्ञानमां जणावा लागी छे, ज्ञानना भेदो नहि. अहाहा! हुं अखंड एक ज्ञायकमूर्ति भगवान छुं-एम द्रष्टि थतां, विकार तो दूर रहो, मति-श्रुत अवस्थाना ज्ञानना भेदो पण बहार रही जाय छे, एकलो अखंड ज्ञायक भगवान ज जणाय छे. भाई! वीतरागनो मार्ग आवो आकरो छे, रागथी मरी जाय त्यारे ध्रुव चैतन्यबिंब जणाय एवुं छे. ११ मी गाथामां आवे छे के त्रिकाळी भूतार्थ-सत्यार्थ द्रव्यस्वभावना आश्रये सम्यग्दर्शन थाय छे. एमां भेद तूटी जाय छे एम अहीं कहे छे. चैतन्यरसनो कंद प्रभु आत्मा जाज्वल्यमान चैतन्यसूर्य छे. एना पर द्रष्टि करतां मति- श्रुतादि ज्ञानना खंडरूप भेदोने तोडी पाडतुं अखंड ज्ञान प्रत्यक्ष प्रगट थाय छे. ज्ञानमां अखंड ज्ञाननो सूर्य प्रत्यक्ष जणायो एटले प्रत्यक्ष प्रगट थाय छे एम कह्युं छे. हवे कहे छे-‘ननु’ अहो! ‘इह’ आवा ज्ञानमां ‘कर्तृकर्मप्रवृत्तेः’ (परद्रव्यनां) कर्ताकर्मनी प्रवृत्तिनो ‘कथम् अवकाशः’ अवकाश केम होई शके?

वस्तु अखंड एकरूप चैतन्यस्वभावमय छे. तेमां कोई एवी शक्ति नथी जे विकार करे. आवा शक्तिमान द्रव्य उपर द्रष्टि पडतां ज्ञाननी वर्तमान दशा ज्ञाता-द्रष्टास्वभावे प्रगट थई छे. अहो! आवा ज्ञानमां कर्ताकर्मनी प्रवृत्तिनो अवकाश केम होई शके? ज्ञायक-स्वरूप त्रिकाळीमां स्वपरने प्रकाशे एवी त्रिकाळ एनी शक्ति छे. त्रिकाळीने जाणे एवी एमां शक्ति छे. नियमसारमां आवे छे के त्रिकाळ ज्ञान-दर्शननो उपयोग ए त्रिकाळने जाणे ज छे. वस्तुनो स्वभाव आवो छे एनी वात छे. आ परिणमनरूपे (उपयोग) छे एनी वात नथी. त्रिकाळी वस्तुने जाणवानो स्वभाव त्रिकाळ शक्तिरूपे छे एम वात छे. परिणतिरूपे जाणे ए नहि. बहु सूक्ष्म वात, भाई! अहीं कहे छे के ज्ञानस्वभावना परिणमनमां रागनुं कर्तापणुं अने रागनुं कर्मपणुं एवो अवकाश केम होई शके? स्वभावनो आश्रय लईने जे ज्ञान-श्रद्धान प्रगट थयुं तेमां आखो आत्मा जणायो, श्रद्धामां आव्यो. ते ज्ञान, जे पर्यायमां रागनी अशुद्धता छे, के जे अशुद्धतानी परिणति छे तेने व्यवहारे जाणे, व्यवहार ते काळे जाणेलो प्रयोजनवान छे; परंतु ज्ञानी रागनो कर्ता अने राग एनुं कार्य-एवो ज्ञानमां अवकाश कयां छे? (नथी ज). अनादिनी आवी पोतानी सर्वज्ञस्वभावी चीज छे. अनादिथी साधक जीवो छे, मिथ्याद्रष्टि जीवो पण अनादिथी छे. तेम जगतनी चीजो पण अनादिथी छे. अने ते सर्वने जाणनारनो विरह पण कदी जगतमां पडतो नथी. एवी ज रीते भगवान सर्वज्ञ-देवनी प्रतिमा पण अनादि काळथी छे. तेनो पण कदी विरह होतो नथी.