Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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प२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ ज्ञानी नथी तेथी ज्ञानीने बंध नथी; कारण के विकार के जे बंधरूप छे अने बंधनुं कारण छे ते तो बंधनी पंक्तिमां छे, ज्ञाननी पंक्तिमां नथी. आ अर्थना समर्थनरूप कथन आगळ जतां गाथाओमां आवशे.

अहीं कळशरूप काव्य कहे छेः-

* कळश ४७ः श्लोकार्थ उपरनुं प्रवचन *

जुओ! गाथामां त्रण बोलथी भेदज्ञान समजाव्युं छे. पुण्य-पापना भाव अशुचि छे, जड छे, दुःखरूप छे; अने भगवान आत्मा त्रिकाळी ध्रुव भगवान अति निर्मळ, विज्ञानघनस्वरूप, आनंदरूप छे. आम बंनेनी भिन्नता जाणीने जे पर्यायबुद्धि दूर करीने स्वभावसन्मुख थाय छे तेने भेदज्ञान प्रगट थाय छे. आवुं भेदज्ञान जेने अंतरंगमां प्रगट थयुं छे ते आत्माने- ‘परपरिणतिम् उज्झत्’ परपरिणतिने छोडतुं, ‘भेदवादान् खण्डयत्’ भेदनां कथनोने तोडी पाडतुं, ‘इदम् अखण्डम् उच्चण्डम् ज्ञानम्’ आ अखंड अने अत्यंत प्रचंड ज्ञान ‘उच्चैः उदितम्’ प्रत्यक्ष उदय पाम्युं छे.

जुओ! आ अखंड अने अत्यंत प्रचंड ज्ञान परपरिणतिने छोडतुं उदय पाम्युं छे. परपरिणति एटले विकारनो-पुण्यपापनो भाव. पहेलां जे अनेक प्रकारे पुण्य-पापना भावमां रोकाई रहेतो हतो ते हवे स्वभावनो आश्रय करतां ए भावोने छोडतुं अति प्रचंड ज्ञान उदय पाम्युं छे. हुं अखंड एक ज्ञायकस्वरूप छुं-एवी द्रष्टि थतां राग मारुं कर्तव्य छे ए द्रष्टि छूटी गई अने रागथी भिन्न पडीने अति तीक्ष्ण ज्ञान प्रगट थयुं. भगवान आत्मा चित्शक्तिरूप छे. पण पुण्य-पापनी रुचिना कारणे चित्शक्ति रोकाई गई हती. अरे! विकार-राग मारुं कर्तव्य, दया, दान, व्रतादि मारां कार्य-एम मानतां चित्शक्ति ढंकाई गई हती परंतु अखंड एकरूप चिदाकार चैतन्यमय आत्मानी द्रष्टि करतां रागनी रुचि छूटी गई, एनो महिमा छूटी गयो अने प्रचंड ज्ञानशक्तिनी प्रगटता थई. आम शक्ति जे हती ते प्रगट थई ते धर्म छे. जे ज्ञान परमां अटक्तुं हतुं ते स्वभावमां स्थित थयुं ते धर्म छे.

वळी आ अखंड अने अत्यंत प्रचंड ज्ञान भेदनां कथनोने तोडी पाडतुं प्रगट थयुं छे. अहाहा...! अखंड एकरूप ज्ञायक उपर द्रष्टि जतां भेदवाद खंडखंड थई जाय छे अने अखंड ज्ञान प्रगट थाय छे. जुओ! आ केवळज्ञाननी वात नथी. केवळज्ञान तो पर्याय छे. अहीं तो अखंड ज्ञान प्रगट थाय छे एम वात छे. अहाहा! एकलुं ज्ञान-ज्ञान-ज्ञान चैतन्यसामान्य एकसद्रश ध्रुव स्वभाव जेमां पर्यायनो अभाव छे ते प्रगट थाय छे एनी वात छे. अहाहा! मति-श्रुतज्ञान आदि जे खंडखंडरूप भेदो हता तेमने दूर करतुं-मटाडतुं अखंड ज्ञान उदय पाम्युं छे. एभदनी द्रष्टिमां भेदवाद मटी जाय छे. अहा! ओछा उघाडने लईने ज्ञेयना निमित्तथी ज्ञानमां जे खंड पडता