समयसार गाथा ७० ] [ प१
आस्रवो अशुचि छे, जड छे, दुःखनां कारणो छे. आत्मा पवित्र छे, ज्ञाता छे, सुखस्वरूप छे. ए रीते लक्षणभेदथी बंनेने भिन्न जाणीने आस्रवोथी आत्मा निवृत्त थाय छे. पुण्य-पापने जे पहेलां उपादेयपणे मानतो तेने हवे हेय जाणीने आत्माने उपादेयपणे स्वीकारे छे. तेने कर्मनो बंध थतो नथी. स्व आश्रित निश्चय अने पराश्रित व्यवहार ते एक ज सिद्धांत छे. शुभभाव ते धर्म नथी, धर्मनुं कारण पण नथी.
आत्मा अने आस्रवोनो भेद जाण्या छतां जो आत्मा आस्रवोथी निवृत्त न थाय तो ते भेदज्ञान ज नथी, अज्ञान ज छे.
अहीं कोई प्रश्न करे के अविरत सम्यग्द्रष्टिने मिथ्यात्व अने अनंतानुबंधी प्रकृत्तिओनो तो आस्रव नथी थतो पण अन्य प्रकृतिओनो तो आस्रव थईने बंध थाय छे; तेने ज्ञानी कहेवो के अज्ञानी? तेनुं समाधानः- सम्यग्द्रष्टि जीव ज्ञानी ज छे, कारण के ते अभिप्रायपूर्वकना आस्रवोथी निवर्त्यो छे. धर्मीने ज्ञानधारा प्रगट थई गई छे. रागधारा भले हो, अभिप्रायथी ते रागथी निवर्त्यो ज छे. अस्थिरता टळीने स्थिरता थई नथी, पण अभिप्रायमां तेने रागनो आदर नथी. स्वभावनुं स्वामीपणुं तेने प्रगटयुं छे अने परनुं-रागनुं स्वामीपणुं छूटी गयुं छे. माटे, ज्यां सुधी तेने चारित्रमोहनो उदय छे त्यां सुधी तेना उदय अनुसार जे आस्रवबंध थाय छे तेनुं स्वामीपणुं नथी. उदय अनुसार एटले उदय होय छे, पण पोतानी योग्यता प्रमाणे आस्रव थाय छे. उदय छे ते प्रमाणे ज आस्रव-बंध थाय एम नथी. नहितर तो कोई छूटवानुं बने ज नहि. उदय होय छतां पोतानी उपादान योग्यता अनुसार आस्रव थाय.
पोताना पुरुषार्थनी मंदताथी ज्ञानीने राग थाय छे, पण रागनो तेने अभिप्राय नथी. अभिप्रायमां तो ते आस्रव-बंधथी सर्वथा छूटवा इच्छे छे. तेथी ते ज्ञानी ज छे.
ज्ञानीने बंध थतो नथी एम कह्युं छे तेनुं कारण आ प्रमाणे छेः- मिथ्यात्वसंबंधी बंध जे अनंत संसारनुं कारण छे ते ज अहीं प्रधानपणे विवक्षित छे, कहेवा धारेलो छे. अविरति आदिथी बंध थाय छे ते अल्प स्थिति-अनुभागवाळो छे, दीर्घसंसारनुं कारण नथी; तेथी तेने प्रधान गणवामां आव्यो नथी.
राग थाय ते संसारनुं कारण छे, पण ज्ञानीने ते राग दीर्घ संसारनुं कारण नथी तेथी तेने प्रधान गण्यो नथी.
अथवा तो आ प्रमाणे कारण छेः- ज्ञान बंधनुं कारण नथी. ज्यां सुधी ज्ञानमां मिथ्यात्वनो उदय हतो त्यां सुधी ते अज्ञान कहेवातुं हतुं अने मिथ्यात्व गया पछी अज्ञान नथी, ज्ञान ज छे. तेमां जे कांई चारित्रमोह संबंधी विकार छे तेनो स्वामी