Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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प० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ कर्युं छे. मंद रागनी लाख क्रियाओ करे, पण ए धर्म नथी. रागथी निवर्तेलुं ज्ञान धर्म छे; आवो मार्ग छे.

रागनी मंदतानी क्रिया ते क्रिया अने परलक्षी आत्मानुं ज्ञान-एम ‘ज्ञानक्रियाभ्याम् मोक्षः’ कोई कहे छे तो ते वात यथार्थ नथी; अहीं तेनुं खंडन कर्युं छे. रागथी भिन्न पडेलुं स्वरूपनुं ज्ञान ते ज्ञान अने ज्ञान-स्वरूपमां ठरवुं-रमवुं ते क्रिया. आ प्रमाणे ‘ज्ञानक्रियाभ्याम् मोक्षः’ यथार्थ छे. कळशटीकामां कळश २६७मां आवे छे के ज्ञान अने क्रियानयने परस्पर तीव्र मैत्री छे. एटले के ‘शुद्ध स्वरूपनो अनुभव अशुद्ध रागादि परिणामने मटाडीने थाय छे.’-‘शुद्ध स्वरूपनो अनुभव छे ते रागादि अशुद्ध परिणतिने मटाडीने छे, रागादि अशुद्ध परिणतिनो विनाश शुद्ध स्वरूपना अनुभव सहित छे.’ आने त्यां परस्पर अत्यंत मैत्री कही छे. एने जे पात्र थयो छे ते जीव समकिती छे, (धर्मिष्ठ छे) रागनी मंदतानी क्रिया थाय ते धर्म नथी, पण राग-परिणाम मटाडीने जे निर्मळ परिणाम प्रगट थाय ते धर्मनी क्रिया छे, ते मोक्षमार्ग छे.

‘वळी जे आत्मा अने आस्रवोनुं भेदज्ञान छे ते पण जो आस्रवोथी निवृत्त न होय तो ते ज्ञान ज नथी एम सिद्ध थवाथी ज्ञाननो अंश एवा (एकांत) ज्ञाननयनुं पण खंडन थयुं.’ एकलुं धारणारूप जाणपणुं करीने माने के मने ज्ञान थई गयुं, पण अंदर ज्ञानमां एकाकार न थाय तो ते ज्ञान ज नथी. ते एकान्त ज्ञाननयनुं अहीं खंडन कर्युं. एकलो ज्ञाननो उघाड छे पण आत्मामां एकाग्र थयो ज नथी तो ते ज्ञानने ज्ञान कहेता ज नथी. क्षयोपशमनो अंश छे ते वस्तु नथी. श्रीमद्जीए पण कह्युं छे ने-

“कोई क्रियाजड थई रह्या, शुष्कज्ञानमां कोई,
माने मारग मोक्षनो,
करुणा उपजे जोई.”

एकने क्रियाजड कह्या, बीजाने शुष्कज्ञानी. बंनेनो निषेध करीने कहे छे के एनी दशा जोईने अमने करुणा थई आवे छे.

रागथी निवर्ततुं नथी अने स्वभावमां प्रवर्ततुं नथी ए ज्ञान ज नथी. क्षयोपशम ज्ञानने कोई सम्यग्ज्ञान माने एनो अहीं निषेध कर्यो छे.

अहीं एकान्त क्रियानय अने एकान्त ज्ञाननय ए बन्ने मिथ्यामतनुं खंडन कर्युं छे. रागनी मंदतानी क्रियामां धर्म माने ते क्रियाजड छे. अने जाणवामात्रथी भेदज्ञान माने ते शुष्कज्ञानी छे. बीजी रीते कहीए तो-व्यवहार करतां करतां धर्म थाय एवुं माने ए एकान्त क्रियानयनुं अहीं खंडन कर्युं छे. तथा परलक्षी जाणपणामात्रथी ज्ञान थाय एवुं माने ते एकान्त ज्ञाननयनुं अहीं खंडन कर्युं छे.

अहाहा! वस्तु ज्ञान अने आनंदनुं ढीम छे. रागथी भिन्न पडी तेमां एकत्वपणे परिणमेलुं ज्ञान ज्ञान छे अने एमां रमणता करवी ते क्रिया छे, अने ते मोक्षमार्ग छे.