प८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ पोताना अज्ञान वडे आत्मामां उत्पन्न थता जे आ क्रोधादिक भावो ते सर्वने क्षय करुं छुं-एम आत्मामां निश्चय करीने, घणा वखतथी पकडेलुं जे वहाण तेने जेणे छोडी दीधुं छे एवा समुद्रना वमळनी जेम जेणे सर्व विकल्पोने जलदी वमी नाख्या छे एवो, निर्विकल्प, अचलित निर्मळ आत्माने अवलंबतो, विज्ञानघन थयो थको, आ आत्मा आस्रवोथी निवर्ते छे.
परद्रव्य प्रत्ये ममतारहित छुं, ज्ञानदर्शनथी पूर्ण वस्तु छुं’. ज्यारे ते ज्ञानी आत्मा आवा पोताना स्वरूपमां रहेतो थको तेना ज अनुभवरूप थाय त्यारे क्रोधादिक आस्रवो क्षय पामे छे. जेम समुद्रना वमळे घणा काळथी वहाणने पकडी राख्युं होय पण पछी ज्यारे वमळ शमे त्यारे ते वहाणने छोडी दे छे, तेम आत्मा विकल्पोना वमळने शमावतो थको आस्रवोने छोडी दे छे.
हवे पूछे छे के कई विधिथी, कई रीतथी आ आत्मा आस्रवोथी निवर्ते छे? पुण्य- पापना भाव छे ते आस्रव छे, मलिन छे, अचेतन छे, दुःख छे, चैतन्यनी जातथी विरुद्ध कजात छे. अहाहा! जेने स्वरूप समजवानी गरज थई छे ते शिष्य पूछे छे के प्रभो! आ आत्मा पुण्य-पापना भावोथी कई विधिथी निवर्ते छे? अंदर आस्रवोथी निवर्तवानो पोकार थयो छे ते पूछे छे के आ (अज्ञान-कर्ताकर्म)नी प्रवृत्तिथी निवृत्ति कई रीते थाय? तेना उत्तररूप गाथा कहे छेः-
हुं आ आस्रवोने क्षय पमाडुं छुं. अहाहा! शैली तो जुओ! (आत्मा) आम करे तो आम थाय एम नथी लीधुं. ‘हुं’ क्षय पमाडुं छुं एम वात लीधी छे. गजब शैली छे! शुं कहे छे? ‘हुं आ आत्मा-प्रत्यक्ष अखंड अनंत चिन्मात्रज्योति अनादि-अनंत नित्य-उदयरूप विज्ञानघनस्वभावभावपणाने लीधे एक छुं.’ ‘अहमेक्को’ कह्युं छे ने? एनी आ व्याख्या करी.
‘हुं’ शब्दथी पोतानी अस्ति सिद्ध करी छे अने ‘आ’ थी प्रत्यक्ष अस्ति दर्शावी छे. छे ने के-हुं आ आत्मा प्रत्यक्ष चिन्मात्र ज्योति छुं? प्रत्यक्ष थई शके ए वात नथी. प्रत्यक्ष छे ज. भगवान आत्मा प्रत्यक्ष छे. शक्तिना अधिकारमां बारमी ‘स्वयं प्रकाशमान विशद एवा स्वसंवेदनमयी (स्वानुभवमयी) प्रकाशशक्ति’ कही छे. वस्तु पोते पोताथी प्रत्यक्ष थाय एवा प्रकाशगुण सहित छे. आत्मानो एवो प्रकाशस्वभाव छे के पोते ज पोताना स्वसंवेदनमां प्रत्यक्ष प्रकाशमान थाय छे.