समयसार गाथा ७प ] [ ११७ छे. पोतामां रहीने जाणे बस! पोतामां रहीने जाणनार, परमां जईने परनो जाणनार एम नहि, पोते साक्षी थाय छे. आवो वीतरागनो कहेलो वीतराग स्वरूप ज मार्ग छे.
भाई! आ देह छूटी जशे; कोई सगां संबंधी साथे रहेशे नहि. ज्यांथी देह छूटीने अहीं आव्यो त्यांनां सगांवहालां संभाळतां होय पण एथी शुं? कोई साथे रहे एम छे? कोई एनुं छे? भाई! कोई तारुं नथी. एक चैतन्यस्वभावमय ज्ञानानंदस्वभावी आत्मा एवो तुं तारो छे. आ गाम, आ मकान, आ देह, आ रागादि विकल्पो इत्यादि मारा छे एम कहेवाय पण तेथी शुं ते तारा थई गया? व्यवहारथी बोलाय एथी शुं? गाम मकान, देह, राग आदि पदार्थो तारा नथी अने ए तारां कार्य पण नथी, तुं एमनो कर्ता पण नथी. तुं तो नित्यानंदस्वरूप ज्ञाता-द्रष्टास्वभावी आत्मा छो अने ज्ञाताद्रष्टानुं निर्मळ परिणमन ए ज तारुं कर्म-कार्य छे. आवुं ज वस्तुस्वरूप छे; तेने यथार्थ जाणवुं ते ज्ञानीनुं कर्म छे.