११६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ भिन्न चीज छे. परंतु ज्ञायकस्वभावी आत्मा अने तेनी निर्मळ वीतरागी परिणतिने व्याप्यव्यापकपणुं छे केमके ते बन्ने अभिन्न तत्स्वभावी छे. द्रव्य व्यापक छे अने राग एनुं व्याप्य छे एम नथी; परंतु द्रव्य व्यापक अने तेनी निर्मळ परिणति एनुं व्याप्य एम व्याप्यव्यापकपणुं छे. जुओ! पंडित श्री जयचंदजीए केटलुं स्पष्ट कर्युं छे! पहेलांना पंडितोए केवुं सरस काम कर्युं छे! कहे छे के पर्यायनी सत्ता अने द्रव्यनी सत्ता बे जुदी नथी. जेम परद्रव्यनी सत्ता जुदी छे तेम द्रव्य अने तेनी निर्मळ परिणतिनी सत्ता जुदी नथी.
आम तो द्रव्यनी सत्ता अने पर्यायनी सत्ता बे भिन्न छे. ए अंदर-अंदरनी (परस्परनी) अपेक्षाए वात छे. पण परनी अपेक्षाए तो द्रव्य अने पर्यायनी सत्ता अभिन्न एक छे. खरेखर तो त्रिकाळी ध्रुव द्रव्यनां सत्ता अने क्षेत्र तेनी निर्मळ पर्यायनां सत्ता अने क्षेत्रथी भिन्न छे. पण ए तो अंदर-अंदर परस्परनी द्रव्य अने पर्यायनी अपेक्षाए वात छे. परंतु अहीं तो एम सिद्ध करवुं छे के पर्याय अने द्रव्यनुं क्षेत्र एक छे, केमके अभिन्न सत्तावाळा पदार्थमां व्याप्यव्यापकपणुं होय छे. परनी सत्ताथी पोताना द्रव्य-पर्यायनी सत्ता भिन्न छे अने पोतानां द्रव्य-पर्याय बेनी सत्ता अभिन्न छे एम अहीं सिद्ध करवुं छे.
सत्ता भिन्न होय एवा पदार्थमां व्याप्यव्यापकपणुं न ज होय. रागादि विभाव भिन्न सत्तावाळो पदार्थ छे. तेनी साथे आत्माने व्याप्यव्यापकपणुं नथी. वस्तु भिन्न छे माटे क्षेत्र भिन्न छे. तेथी व्याप्यव्यापकपणुं नथी अने माटे आत्मा अने रागादि विभावने कर्ताकर्मपणुं नथी.
ज्यां व्याप्यव्यापकभाव होय त्यां ज कर्ताकर्मभाव होय; व्याप्यव्यापकभाव विना कर्ताकर्मभाव न होय. एवुं जे जाणे ते पुद्गलने अने आत्माने कर्ताकर्मभाव नथी एम जाणे छे. कळशटीकामां ‘जीवसत्त्वथी पुद्गलद्रव्यनुं सत्त्व भिन्न छे, निश्चयथी व्याप्यव्यापकता नथी’ एम कह्युं छे. पुद्गल अने पुद्गलना निमित्तथी थती विकारी पर्याय ए बधुं पुद्गल छे. आवुं जे जाणे ते विकारने अने आत्माने कर्ताकर्मभाव नथी एम जाणे छे. कर्मना परिणामनो पोते कर्ता नथी एम जाणे त्यां रागादि विकारनो पण पोते कर्ता नथी एम जाणे छे. आम जाणतां लक्ष त्यांथी छूटी आत्मा उपर लक्ष जाय छे. परनुं कर्तापणुं छूटे त्यां रागनुं कर्तापणुं पण छूटी जाय छे. अहा! भरतमां केवळज्ञानीना विरह पडया पण भाग्यवश आवी चीज (समयसार) रही गई. कोई वळी कहे छे के समयसार वांचो छो अने बीजुं शास्त्र केम नहि? पण भाई! तत्त्वज्ञानना विषयनी मुख्यता द्रव्यानुयोगना शास्त्रमां होय छे. सम्यग्दर्शनना विषयनुं द्रव्यानुयोगना शास्त्रमां निरूपण होय छे.
अहीं कहे छे के पुद्गलने अने आत्माने कर्ताकर्मभावथी नथी. आम जाणतां ते ज्ञानी थाय छे. एटले के रागनो जाणनार थाय छे, कर्ता थतो नथी. ते कर्ताकर्मभावथी रहित थाय छे अने ज्ञाता-द्रष्टा बनी जगतनो साक्षीभूत थाय छे. बधानो जाणनार साक्षी थाय