Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा ७प ] [ ११प (व्यापकनुं) व्याप्य छे. आम होवाथी द्रव्य तो व्यापक छे अने पर्याय व्याप्य छे.’ त्रिकाळी वस्तु जे द्रव्य ते व्यापक छे केमके ते दरेक अवस्थामां होय छे. अने वर्तमान वर्तती अवस्था ते व्यापकनुं व्याप्य छे.

‘द्रव्य-पर्याय अभेदरूप ज छे.’ एटले के तेने परवस्तु साथे कांई संबंध नथी. पोतानुं द्रव्य अने पोतानी पर्याय परथी भिन्न छे अने पोते अभेदरूप छे. परथी भिन्न छे ए अपेक्षाए द्रव्य-पर्याय अभिन्न छे एम कह्युं छे. त्यां द्रव्य अने पर्याय एक थयां छे एम नथी. द्रव्य-पर्याय अभेदरूप छे एटले परनी साथे के रागनी साथे कांई संबंध नथी. निर्मळ पर्याय अने द्रव्य अभेद छे एटले के निर्मळ पर्याय छे ते व्यापक एवा द्रव्यनुं व्याप्य छे. ए पर्यायनो कर्ता द्रव्य छे एम अभेदनो अर्थ छे.

अरे भाई! अनंतकाळनी पोतानी चीज छे. तेनी द्रष्टि करवी ते कांई साधारण वात नथी. जे पर्यायबुद्धि अने रागबुद्धि अनादिथी छे तेमां पलटो मारीने द्रव्यबुद्धि करवी ए साधारण (पुरुषार्थनी) वात नथी. भगवान आत्मा पूर्णानंदनो नाथ प्रभु त्रिकाळी ध्रुव द्रव्य छे. ते छे एम ज्यां पर्याय द्रव्य सन्मुख ढळीने तेनो स्वीकार करे छे त्यारे द्रव्य-पर्याय अभेदरूप ज छे. जे पर्याय द्रव्यनी सन्मुख थई ते द्रव्यनो स्वीकार करे छे अने त्यां तेने शांतिनो अनुभव थाय छे. पोते आत्मा व्यापक अने पोतानी निर्मळ पर्याय ते व्याप्य एम अभेदरूप परिणमन छे त्यां शांति छे. पण पोते आत्मा व्यापक अने पुण्य-पापना भाव ते मारुं व्याप्य एम जे माने तेने अशांति छे. आवु ज वस्तुनुं स्वरूप छे.

हवे कहे छे-‘जे द्रव्यनो आत्मा, स्वरूप अथवा सत्त्व ते ज पर्यायनो आत्मा, स्वरूप अथवा सत्त्व. आम होईने द्रव्य पर्यायमां व्यापे छे अने पर्याय द्रव्य वडे व्यपाई जाय छे. आवुं व्याप्यव्यापकपणुं तत्स्वरूपमां ज होय; अतत्स्वरूपमां न ज होय.’

जुओ, शुं कहे छे? जे द्रव्यनुं स्वरूप छे ए ज पर्यायनुं स्वरूप छे. पर्याय एनी जातनी छे ने! पर्याय अने द्रव्य बन्ने एक थया छे एम नथी. पर्याय पर्यायमां रहीने द्रव्यने जाणे छे, द्रव्यमां भळीने जाणती नथी; परंतु परथी भिन्नपणुं छे ए अपेक्षाए द्रव्य अने पर्याय अभिन्न छे एम कह्युं छे. अपेक्षा बराबर समजवी जोईए. आ प्रमाणे द्रव्यनुं स्वरूप वा सत्त्व ते ज पर्यायनुं स्वरूप वा सत्त्व छे, आम होईने एटले के द्रव्य-पर्यायनी अभिन्नता होईने द्रव्य पर्यायमां व्यापे छे अने पर्याय द्रव्य वडे व्यपाई जाय छे.

आवुं व्याप्यव्यापकपणुं तत्स्वरूपमां ज होय छे, अर्थात् अभिन्न सत्तावाळा पदार्थमां ज होय छे. परंतु अतत्स्वरूपमां अर्थात् भिन्न भिन्न सत्तावाळा पदार्थोमां आवुं व्याप्य-व्यापकपणुं होतुं नथी. रागने अने आत्माने व्याप्यव्यापकपणुं नथी केमके बन्ने भिन्न