Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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११४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४

अहाहा...! आत्मा पोते शुद्ध चैतन्यस्वरूप ज्ञाता-द्रष्टा स्वभावथी भरेलो भगवान छे. ते ज्ञाता-द्रष्टा थईने परिणमे ते शोभा छे. पहेलां रागनो कर्ता थईने परिणमतो हतो ते अशोभा हती, अज्ञान हतुं, दुःख हतुं. हवे ते रागना कर्तृत्वरहित थईने ज्ञातास्वभावे ज्ञानपणे, आनंदपणे परिणमतो ते अतीन्द्रिय आनंदनी लहेरथी शोभे छे. स्वरूपना भान विना पहेलां व्यवहारना रागना कर्तापणे परिणमतो हतो ते अज्ञानदशा हती, दुःखदशा हती. हवे प्रबळ विवेकरूप सम्यग्ज्ञाननो प्रकाश प्रगट थतां अज्ञानअंधकारने भेदतो ते रागनो अकर्ता थईने अने ज्ञान अने आनंदनी पर्यायनो कर्ता थईने पोते शोभे छे.

प्रश्नः– व्यवहार साधन अने निश्चय साध्य-एम शास्त्रमां आवे छे ने?

उत्तरः– अरे भाई! ए तो साधननो आरोप करीने कथन कर्युं छे. व्यवहारनो राग जे अतत्भावरूप छे ते तत्स्वभावनुं-निश्चयनुं साधन केम थाय? न ज थाय. अहीं तो रागथी भिन्न पडी, ज्ञायकभाव प्रसरीने-विस्तरीने जे निर्मळ वीतराग परिणति प्रगट थई ते साधन छे एम कह्युं छे. अने त्यारे जे राग छे तेने सहचर वा निमित्त देखीने उपचारथी आरोप करीने साधन कह्युं छे. सर्वत्र व्यवहारनुं लक्षण ज एवुं छे. एक द्रव्यने बीजा द्रव्यमां भेळवीने कथन करे. एकना भावने बीजाना भावमां भेळवीने कथन करे अने कारणमां कार्यने भेळवीने कथन करे एवुं व्यवहारनुं लक्षण छे. मोक्षमार्ग प्रकाशकमां सातमा अधिकारमां पंडितप्रवर श्री टोडरमलजीए निश्चय-व्यवहारनो बहु सरस खुलासो कर्यो छे.

पोताने बेसे नहि एटले विरोध करे, पण शुं थाय? अशुद्धतामां पण पोते स्वतंत्र छे. अनुभव प्रकाशमां कह्युं छे के-तेरी अशुद्धता भी बडी’-एटले के जेने विपरीत बेठुं छे ते त्रिलोकनाथ भगवाननी वाणी सांभळीने पण विपरीत मान्यताथी खसे नहि एवी एनी अशुद्धतानी पण मोटप छे; पोतानी ऊंधी पकड छोडे ज नहि. अहीं कहे छे के राग मारुं कार्य अने हुं रागनो कर्ता ए मान्यता अज्ञान छे. आ विपरीत अभिप्रायने तो प्रथम सुधार. वस्तुस्थितिनो प्रथम ज्ञानमां सम्यक् निर्णय तो कर. स्थिरता न थई शके ए जुदी वात छे. भाई! प्रथम स्वरूप आम ज छे एम निर्णय तो कर. रागनुं कर्तृत्व मारुं नहि, पण ते काळे स्वने अने परने जाणतुं जे मारुं ज्ञान ते मारुं कार्य अने हुं तेनो कर्ता एवा निर्णय सहित जे ज्ञानप्रकाश प्रगट थयो ते अज्ञान-अंधकारने भेदीने पोते अकर्तापणे-ज्ञातापणे परिणमतो कर्तृत्वरहित थईने शोभे छे. आवी अद्भुत आ वात छे. ए कांई वादविवादथी पार पडे एम नथी.

* कळश ४९ः भावार्थ उपरनुं प्रवचन *

‘जे सर्व अवस्थाओमां व्यापे ते तो व्यापक छे अने कोई एक अवस्थाविशेष ते