समयसार गाथा ७प ] [ ११३
अहाहा-! समयसारनी एकेक गाथा अने एकेक कळश अलौकिक छे. आत्मानुं हित केम थाय एनी अहीं वात छे. बहु शास्त्रो भण्यो होय अने व्याख्यान सारुं करे एटले थई गयो मोटो पंडित ज्ञानी ए वात अहीं नथी. तथा घणो बधो बाह्य व्यवहार पाळे माटे ज्ञानी छे एम पण नथी. देव-गुरु-शास्त्रनी (भेदरूप) श्रद्धा अने भक्ति ए तो बधो राग छे. भाई! बहारनी धमाधम ए मार्ग नथी. अहीं कहे छे के भगवान आत्मा तत्स्वभाव जे ज्ञायकभाव ते कर्ता अने तेनी निर्मळ पर्याय ते एनुं कार्य छे, परंतु अतत्स्वभाव जे विभाव तेनो आत्मा कर्ता नहि अने ते विभाव आत्मानुं कर्म नहि. आ प्रमाणे अंतरंगमां द्रष्टि थई एने प्रबळ विवेकरूप (भेदज्ञानरूप) सम्यग्ज्ञाननो सूर्य उग्यो एम अहीं कहे छे.
आवो प्रबळ विवेकरूप सम्यग्ज्ञाननो जे सूर्य प्रगट थयो तेनो सौने ग्रासीभूत करवानो स्वभाव छे. एटले के ते स्वने जाणे अने जे राग होय तेने पण जाणे एवो तेनो स्वभाव छे. जाणवामां बधुं कोळियो करी जाय एवी प्रगट थयेला ज्ञानप्रकाशनी शक्ति छे. जुओ! रागने करे ए तो छे ज नहि, पण राग छे माटे तेने (रागने) जाणे एम पण नथी. ज्ञाननो ए सहज स्वभाव छे के ते जाणवामां राग आदि सर्वने कोळियो करी दे. जे काळे जे जातनो राग अने जे जातनी देहनी स्थिति पोताना कारणे थाय ते काळे ते सर्वने अडया विना ग्रासीभूत करवानो-जाणी लेवानो ज्ञाननो स्वभाव छे.
व्यवहारना रागने ज्ञान जाणी ले छे; त्यां जाणवुं जे थयुं ते आत्मानुं निज कार्य छे पण जे राग छे ए आत्मानुं कार्य नथी. राग मारुं कार्य अने रागनो हुं कर्ता एवी मान्यता तो अज्ञान छे. ए अज्ञानने भेदतो तत्स्वरूपे-ज्ञानस्वरूपे पोते परिणमतो अज्ञानरूपी अंधकारनो नाश करे छे. भाई! आ व्यवहाररत्नत्रयनो शुभराग ते मारुं कार्य अने हुं तेनो कर्ता अथवा व्यवहार रत्नत्रयनो शुभराग ते कर्ता अने जे ज्ञान अवस्था प्रगट थई ते एनुं कार्य एवो अभिप्राय ते अज्ञान छे. आ अज्ञान-अंधकारने भेदतो भगवान आत्मा पोते ज्ञानस्वरूप थईने ते काळे कर्तृत्वरहित थयेलो शोभे छे.
कह्युं ने के जे काळे राग छे ते काळे रागने जाणतुं त्यां ज्ञान छे. ते ज्ञान कर्तृत्वरहित थईने शोभे छे. एटले राग मारुं कार्य अने हुं तेनो कर्ता एवी अज्ञानदशाने भेदतो पोते कर्तृत्वरहित थईने एटले के ज्ञाता थईने शोभे छे. जुओ, रागना कर्तृत्वथी आत्मा शोभतो नथी. पुण्यना परिणाम करवाथी आत्मानी शोभा नथी. एथी पोतानी शोभा मानवी ए तो मिथ्यात्व छे. भाई! वस्तुनुं स्वरूप ज आवुं छे. अहीं तो, आ शास्त्रमां जे छे, तेनुं स्पष्टीकरण थाय छे. माणसने पोतानी मानेली वातनां पकड अने अभिमान होय तेथी आवी सत्य वातने ग्रहण करवी कठण लागे, पण भाई! आ समज्ये ज छूटको छे.