Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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११२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-४ भाषानुं व्याप्यव्यापकपणुं जडमां छे. आत्मा व्यापक थईने अतत्भावरूप एवी भाषाना परिणमनने करे एम होई शके ज नहि. भाई! आ पंडिताईनो विषय नथी. आ तो अंतर स्वरूपद्रष्टिनो विषय छे. जेने जन्म-मरणना दुःखथी छूटवुं होय तेने अहीं कहे छे के ए दुःखना परिणाम पण आत्मानुं व्याप्य नथी. भाई! ए तो अतीन्द्रिय आनंदनो नाथ नित्यानंदस्वरूप प्रभु छे ने! ते व्यापक थईने, प्रसरीने, कर्ता थईने पवित्र आनंदनी पर्यायनुं कार्य करे. एने दुःखनी पर्याय तो अतद्भावरूप छे. ए दुःखनी पर्याय तेनुं व्याप्य केम होय?

आत्मा शुद्ध चैतन्य ज्ञानानंदस्वभावी वस्तु छे. ते व्यापक थईने प्रसरीने खीले तो निर्मळ वीतरागी आनंदनी पर्यायरूपे खीले एवो तेनो स्वभाव छे. जुओ! कागळनो पंखो खीले-प्रसरे तो कागळपणे खीले पण शुं ते लोढापणे खीले खरो? (ना, कदापि नहीं). तेम ज्ञायकस्वरूपी भगवान खीले-प्रसरे तो निर्मळ ज्ञानस्वभावे खीले पण शुं ते राग अने दुःखपणे खीले? (ना). भाई! रागपणे जे खीले-प्रसरे ते आत्मा नहि. अहा! भगवान आत्मानुं व्याप्य तो वीतरागी पर्याय छे. चतुर्थ आदि गुणस्थानमां जे सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप शुद्ध रत्नत्रयनी पर्याय प्रगटे ते आत्मानुं व्याप्य छे.

प्रश्नः– चतुर्थ आदि गुणस्थानमां राग तो होय छे?

उत्तरः– हा, चतुर्थ आदि गुणस्थानमां व्रत, पूजा, भक्ति, दया, दान इत्यादिना शुभभाव होय छे. पण ते शुभभाव ते आत्मानुं व्याप्य कर्म नथी. जे विभाव होय छे तेने ते काळे ते जाणतो प्रवर्ते छे. स्वपरने जाणनारी एनी जे ज्ञाननी पर्याय ते एनुं व्याप्य कर्म छे. ज्ञान रागने जाणे तेथी राग आत्मानुं व्याप्य थई जाय एम छे ज नहि. भाई! आ तो कर्तृत्वना अभिमानना भुक्का बोलावी दे एवी वात छे. तेने अंतरमां बेसाड ने! व्यवहारथी निश्चय थाय एवी तारी मान्यता मिथ्या एकांत छे, केमके कर्ताकर्मपणुं तत्स्वभावमां ज होय छे. अहाहा...! वीतरागी पर्याय ते कार्य अने वीतरागी स्वभाव ते एनुं कारण छे एम अहीं कह्युं छे; पण राग कारण अने वीतरागता एनुं कार्य एम छे ज नहि. शास्त्रोमां जे व्यवहार साधननी वात आवे छे ए तो निमित्त देखीने तेनुं ज्ञान कराववा व्यवहारथी कहेवामां आवेलुं छे. ज्यां जे अपेक्षाथी कथन होय तेनुं यथार्थ ज्ञान करवुं जोईए.

हवे कहे छे- ‘इति उद्दाम–विवेक–घस्मर–महोभारेण’ आवो प्रबळ विवेकरूप, अने सर्वने ग्रासीभूत करवानो जेनो स्वभाव छे एवो जे ज्ञानप्रकाश तेना भारथी ‘तमः भिन्दन्’ अज्ञान-अंधकारने भेदतो, ‘स एषः पुमान्’ आ आत्मा ‘ज्ञानीभूय’ ज्ञानस्वरूप थईने, ‘तदा’ ते काळे ‘कर्तृत्वशून्यः लसितः’ कर्तृत्वरहित थयेलो शोभे छे.