समयसार गाथा ७प ] [ १११ स्वयं भगवान ज्ञायक व्यापक-कर्ता थईने पोतानी व्याप्य एवी निर्मळ मोक्षमार्गनी- सम्यग्दर्शन ज्ञान-चारित्ररूप शुद्ध रत्नत्रयनी पर्यायने करे छे अने ते धर्म छे. आ आत्मानुं व्याप्य कर्म छे; परंतु अतत्स्वरूप एवो जे राग (व्यवहार) ते आत्मानुं व्याप्य नथी, ते आत्मानुं कर्म नथी.
अरेरे! लोकोने अत्यारे व्यवहार अने निमित्तना प्रेममां अंदर जे भिन्न शुद्ध ज्ञायक भगवान पडयो छे तेनां रुचि अने आश्रय आवतां नथी. तेओ बिचारा चोरासीना अवतारमां अतिशय दुःखी थईने जाणे दुःखनी घाणीमां पीलाई रह्या छे. भाई! शुद्ध चैतन्यस्वभावमय वस्तु प्रभु पोते छे एनो महिमा द्रष्टिमां आव्या विना विकारनुं माहात्म्य अंतरथी छूटतुं नथी. अहीं कहे छे के व्याप्यव्यापकभाव तत्स्वभावमां ज होय छे, अतत्स्वभावमां न होय. प्रथम आ सिद्धांत मूकीने कहे छे के व्याप्यव्यापकभावना संभव विना कर्ताकर्मनी स्थिति केवी? भगवान आत्मा कर्ता अने दया, दान, व्रत, भक्ति आदि विभावभाव एनुं कर्म-ए केम होई शके? (न होई शके). अहाहा...! आ बहारनां (दया, दान आदि) काम तो आत्मा करी शके नहि, पण (दया, दान, आदि) विकारना परिणाम पण आत्मानुं काम-कार्य छे एम नथी केमके विभावभाव अतत्भावस्वरूप छे.
त्रिकाळी ज्ञायकभाव शुद्ध चैतन्यघन वस्तु छे ते तत्स्वभावे छे. तेनुं तत्स्वभावे परिणमन थयुं ते एनुं कार्य छे, कर्म छे. त्रिकाळी ध्रुव वस्तु पोते व्यापक थईने पोताना निर्मळ परिणाममां व्यापे ए तो बराबर छे. परंतु ते शुभाशुभ विकारमां व्यापक थईने एने करे ए वात कयांथी लाववी? केमके त्यां व्याप्यव्यापकभावनो अभाव छे. व्यवहार रत्नत्रयना शुभभाव ते आत्मानुं कर्तव्य, आत्मानुं व्याप्य कर्म ए स्थिति कयांथी लाववी? अहाहा...! द्रव्ये अने गुणे पवित्रतानो पिंड प्रभु आत्मा छे ते पवित्रताना व्यापकपणे पवित्रतानी व्याप्य अवस्थाने करे छे; परंतु ते विकारनी अवस्थाने व्याप्यपणे करे-ए स्थिति कयांथी लाववी? एम छे ज नहि.
केटलाकने आकरुं पडे छे, पण शुं थाय? मार्ग तो आ ज छे, भाई! आ समजवुं ज पडशे. बहारमां तो कांई नथी. आ पैसा, बंगला, मोटर, संपत्ति अने आबरू-ए धूळमां कय ांय सुख नथी. अहीं कहे छे के परवस्तु व्यापक थईने एनी पोतानी पर्यायने करे ते एनुं कर्म छे. अतत्भाववाळी वस्तु पोते पोताथी परिणमे छे. तेनुं कार्य आ आत्मा करे एम कदी होई शके नहि. आ जीभ हले, वाणी बोलाय ते आत्मानुं व्याप्य नथी. तथा तेमां जे विकल्प-राग थाय ए पण अतत्स्वभावरूप छे. अतत्भावरूप वस्तुनुं कार्य तत्स्वभावी आत्मा करे एम कदीय बनतुं नथी.
प्रश्नः– आ भाषा बोलवानुं जे कार्य थाय ते आत्मा करे छे के नहि?
उत्तरः– आ प्रश्न सं. १९९पमां शंत्रुजयमां थयो हतो. त्यारे कह्युं हतुं के